हिमाचल कैबिनेट विस्तार में फंसा पेंच, क्षेत्रीय और जातीय संतुलन के चलते सुंदर ठाकुर की ताजपोशी अटकी

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Kullu News: हिमाचल प्रदेश में प्रस्तावित मंत्रिमंडल विस्तार अब क्षेत्रीय और जातीय संतुलन की रस्साकशी में उलझ गया है। कुल्लू के विधायक सुंदर सिंह ठाकुर को मंत्री बनाने के फैसले पर नया रोड़ा खड़ा हो गया है। मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू के एलान के बावजूद अब 30 सितंबर के बाद ही अंतिम निर्णय होने की संभावना है।

राजपूत चेहरों की अधिकता बनी बड़ा रोड़ा

प्रदेश में गैर-राजपूत नेताओं का खेमा अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए पार्टी हाईकमान पर लगातार दबाव बना रहा है। वर्तमान में मुख्यमंत्री समेत पांच मंत्री राजपूत हैं। सुंदर ठाकुर को मंत्री पद मिलने पर 12 सदस्यीय कैबिनेट में 50 फीसदी राजपूत सदस्य हो जाएंगे। इसके अलावा स्पीकर कुलदीप पठानिया और उप मुख्य सचेतक केवल पठानिया भी राजपूत समुदाय से हैं।

राज्य में राजपूतों की आबादी करीब 32 से 36 फीसदी और अनुसूचित जाति की 25 फीसदी है। दूसरी सबसे बड़ी आबादी होने के कारण अनुसूचित जाति वर्ग भी अधिक प्रतिनिधित्व की मांग कर रहा है। वर्तमान कैबिनेट में धनीराम शांडिल और यादविंद्र गोमा अनुसूचित जाति, मुकेश अग्निहोत्री और राजेश धर्माणी ब्राह्मण, जबकि चंद्र कुमार ओबीसी वर्ग से आते हैं।

कुल्लू जिले और मंडी संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व

सुंदर ठाकुर के समर्थक मंडी संसदीय क्षेत्र और कुल्लू जिले की राजनीतिक उपेक्षा का तर्क दे रहे हैं। उनका कहना है कि कांगड़ा के मुकाबले मंडी क्षेत्र से केवल जगत सिंह नेगी ही मंत्री हैं। लगभग सभी पिछली सरकारों में कुल्लू जिले को कैबिनेट में स्थान मिलता रहा है। इसलिए क्षेत्रीय संतुलन साधने के लिए उनका मंत्री बनना जरूरी माना जा रहा है।

नेताओं ने अतीत के उदाहरण देते हुए सत महाजन और बृज बिहारी लाल बुटेल जैसे नामों का हवाला दिया। पिछले दिनों दिल्ली में मंत्रियों के एक समूह ने हाईकमान को अपना फीडबैक सौंपा है। चर्चा है कि विस्तार के साथ कुछ मंत्री अतिरिक्त विभागों की भी मांग कर रहे हैं। अब देखना होगा कि हाईकमान जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों को कैसे साधता है।

Desh Raj
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