हिमाचल में जलवायु परिवर्तन से गद्दी और गुज्जर समुदायों के पारंपरिक प्रवास पर गहराया संकट, आजीविका पर असर

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Shimla News: हिमाचल प्रदेश के ऊंचे हिमालयी इलाकों में गद्दी और गुज्जर समुदायों का मौसमी प्रवास अब कठिन हो गया है। जलवायु परिवर्तन, सिकुड़ते चरागाहों और बदलते रास्तों के कारण इन पारंपरिक पशुपालकों के सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया है। उनकी पीढ़ियों पुरानी आजीविका और जीवनशैली बुरी तरह प्रभावित हो रही है।

गद्दी और गुज्जर समुदायों की जीवनशैली और भूगोल

गद्दी और गुज्जर समुदाय मौसमी प्रवास पर निर्भर हैं। वे गर्मियों में ऊंचे चरागाहों और सर्दियों में निचले क्षेत्रों का रुख करते हैं। गद्दी मुख्यतः भेड़-बकरी पालते हैं और चंबा-कांगड़ा में रहते हैं। गुज्जर भैंस पालन करते हैं। 2011 की जनगणना के मुताबिक राज्य में 3.9 लाख एसटी आबादी में ये प्रमुख हैं।

अनिश्चित मौसम से बिगड़ा पारंपरिक प्रवास का समय

सोलन के 62 वर्षीय गुज्जर चरवाहे हसन दीन और भरमौर के 61 वर्षीय गद्दी चरवाहे दलती राम बताते हैं कि अब मौसम का पुराना अनुमान काम नहीं करता। बर्फबारी का समय अनिश्चित हो गया है। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार 1950 के बाद पश्चिमी हिमालय का औसत तापमान लगभग 1.4 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है।

सड़क निर्माण और विकास से बंद हुए पारंपरिक रास्ते

सेंटर फॉर पेस्ट्रोलिज्म के मैपिंग प्रोजेक्ट में गद्दी समुदाय के 1,637 प्रवास मार्गों का दस्तावेजीकरण किया गया। अध्ययन से पता चला कि सड़क निर्माण, हाइड्रो प्रोजेक्ट्स और शहरीकरण के कारण पुराने रास्ते बंद हो गए हैं। सड़कों पर भारी ट्रैफिक के कारण चरवाहों को रात के समय सफर करना पड़ रहा है।

पशुधन पर बढ़ रहा बीमारियों और खरपतवार का खतरा

तापमान बढ़ने से लैंटाना जैसी खरपतवार 6,000 फीट की ऊंचाई तक फैल चुकी है। इससे पौष्टिक घास कम हो रही है। भरमौर के गद्दी चरवाहे स्वरूप और गुज्जर पशुपालक मोहम्मद आलम ने बताया कि खुरपका-मुंहपका और गलघोटू जैसी बीमारियों से हर साल लगभग 10 फीसदी पशुधन का नुकसान हो रहा है।

महिलाओं पर बढ़ा काम का बोझ, युवाओं का पलायन

चरागाहों के दूर होने से गुज्जर महिला सफूरा बताती हैं कि पानी और चारा जुटाने में समय बढ़ गया है। वहीं भरमौर के 29 वर्षीय राजू जैसे युवा कम आय और जोखिम के कारण नौकरी की ओर रुख कर रहे हैं। हिमाचल सरकार ने पशुधन सुरक्षा के लिए ‘पहल’ योजना शुरू की है।

Right News Desk
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