भारतीय से निकाह करने पर विदेशी को नहीं मिलता वीजा का अधिकार, केरल हाई कोर्ट ने खारिज की पाकिस्तानी महिला की याचिका

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Kochi News: केरल हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल भारतीय नागरिक से शादी करने पर किसी विदेशी नागरिक को अपने आप भारतीय वीजा पाने का हक नहीं मिल जाता। अदालत ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी एक दंपती की याचिका खारिज करते हुए की। इस मामले में पत्नी पाकिस्तानी नागरिक है और भारत आना चाहती थी।

याचिकाकर्ता की दलीलें और केंद्र सरकार का विरोध

याचिकाकर्ता पाकिस्तानी महिला की शादी दुबई में एक भारतीय नागरिक से हुई थी और दोनों विदेश में रहते हैं। महिला पारिवारिक शादी में शामिल होने के लिए भारत आना चाहती थी। अर्जी में दलील दी गई कि वीजा आवेदन का अवसर न मिलना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत मूल अधिकारों का सीधा हनन है।

महिला ने भारतीय की पत्नी होने के नाते लॉन्ग-टर्म वीजा की आवश्यकता जताई थी। केंद्र सरकार ने याचिका का कड़ा विरोध किया। केंद्र ने कहा कि विदेशी नागरिकों का देश में प्रवेश पूरी तरह कानून और तय सरकारी नीतियों के तहत होता है। वीजा जारी करना पूरी तरह से सरकार के अधिकार क्षेत्र का मामला है।

पहलगाम हमले के बाद पाबंदियां और केंद्र के संप्रभु अधिकार

अदालत ने पहलगाम हमले के बाद पाकिस्तानी नागरिकों के वीजा निलंबन के फैसले को सही ठहराया। फॉरेनर्स एक्ट 1946 की धारा 3 के तहत 25 अप्रैल 2025 से सभी वीजा सेवाओं पर रोक लगाई गई थी। कोर्ट ने माना कि यह आदेश अब भी प्रभावी है और जब तक वापस नहीं होता, आवेदन स्वीकार नहीं होंगे।

केरल हाई कोर्ट ने कहा कि विदेशी नागरिकों के देश में आने, रहने और जाने को नियंत्रित करना केंद्र सरकार का विशेष संप्रभु अधिकार है। यह शक्ति राष्ट्रीय सुरक्षा, देश की अखंडता और सार्वजनिक व्यवस्था से सीधे जुड़ी हुई है। ऐसे में भारतीय से शादी करने पर भी वीजा मांगने का कानूनी अधिकार नहीं बनता।

संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 पर अदालत का रुख

अदालत ने याचिकाकर्ताओं द्वारा दिए गए अनुच्छेद 14 और 21 के तर्कों को सिरे से खारिज कर दिया। पीठ ने साफ किया कि यद्यपि अनुच्छेद 14 गैर-नागरिकों पर भी लागू होता है, लेकिन इसका दावा केवल भारतीय सीमा के भीतर मौजूद व्यक्ति ही कर सकता है। सीमा के बाहर से यह अधिकार नहीं मांगा जा सकता।

हाई कोर्ट का यह फैसला पाकिस्तानी नागरिकों के वीजा पर जारी कड़े प्रतिबंधों के बीच आया है। गौरतलब है कि केरल हाई कोर्ट ने हाल ही में मंदिर प्रबंधन पर भी एक अन्य फैसला दिया था, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि किसी पुजारी का किसी विशेष जाति या वंश से होना अनिवार्य नहीं है।

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