ज्वालामुखी / कांगड़ा : हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में पंचायत समिति सुराणी और नगर परिषद ज्वालामुखी के बीच एक बहुमूल्य संपत्ति को लेकर विवाद अब और भी गहरा गया है। पंचायत समिति सुराणी के सदस्यों ने उनकी करोड़ों रुपये की संपत्ति को बिना उनकी सहमति के शहरी विकास विभाग के नाम करने के विरोध में मोर्चा खोल दिया है।
इस फैसले के विरोध में गुरुवार को पंचायत समिति सुराणी के सदस्यों ने ज्वालामुखी उप-मण्डलाधिकारी (SDM) कार्यालय का रुख किया। सदस्यों की योजना एसडीएम को एक लिखित प्रार्थना पत्र सौंपने की थी, लेकिन उनकी अनुपस्थिति के चलते प्रदेश के मुख्यमंत्री के नाम यह ज्ञापन नायब तहसीलदार ज्वालामुखी को सौंपा गया। इस ज्ञापन के जरिए प्रशासन की कार्यप्रणाली पर तीखे सवाल दागे गए हैं।
क्या है पूरा मामला?
उपायुक्त कांगड़ा द्वारा 4 अगस्त 2026 को एक आदेश पारित किया गया था, जिसके तहत पंचायत समिति सुराणी की ज्वालामुखी स्थित संपत्ति (जिसमें 49 दुकानों का एक बड़ा शॉपिंग कॉम्प्लेक्स और एक कार पार्किंग शामिल है) का इंतकाल सरकार के नाम करते हुए कब्ज़ा ‘शहरी विकास विभाग’ का दर्ज करने के निर्देश दिए गए थे। समिति का कहना है कि इस संपत्ति से होने वाली आय ही उनके विकास कार्यों का मुख्य आधार है।
अधिकारियों की नीयत पर दागे तीखे सवाल: क्या कोई व्यक्तिगत रुचि है?
पंचायत समिति सदस्यों ने इस पूरी प्रक्रिया में खंड विकास अधिकारी (BDO), उप-मंडलाधिकारी (SDM) और उपायुक्त (DC) की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है। समिति सदस्यों ने प्रशासन से सीधा सवाल पूछा है कि आखिर पंचायत समिति की इस ज़मीन को ट्रांसफर करने के पीछे सरकार और प्रशासन का असली उद्देश्य क्या है? क्या BDO, SDM और DC की इस करोड़ों की संपत्ति में कोई व्यक्तिगत रुचि है, जिसके चलते समिति के हितों की अनदेखी कर म्युनिसिपल काउंसिल को फायदा पहुंचाया जा रहा है?
चुनाव में देरी क्यों? जनता मांग रही जवाब
ज्ञापन में समिति सदस्यों ने अध्यक्ष-उपाध्यक्ष के चुनाव को लटकाए रखने पर भी भारी रोष व्यक्त किया है। उनका कहना है कि जून 2026 में नवनिर्वाचित पंचायत समिति सुराणी के सदस्यों की शपथ हो चुकी थी। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि अधिकारियों की इस संपत्ति में कोई व्यक्तिगत रुचि नहीं है, तो फिर समिति के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव करवाने में इतनी देरी क्यों की जा रही है?
समिति सदस्यों का कहना है कि क्षेत्र की जनता अब यह जानना चाहती है कि आखिर चुनाव प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में प्रशासन के सामने क्या बाधा आ रही है। उन्होंने प्रशासन से कड़ी अपेक्षा जताई है कि इस पूरे मामले में पूर्ण पारदर्शिता बरती जाए, जनता को स्थिति का स्पष्ट जवाब दिया जाए और बिना किसी देरी के नियमानुसार चुनाव प्रक्रिया संपन्न करवाई जाए ताकि पंचायत समिति हाउस अपने फैसले खुद ले सके।
आंदोलन की दी चेतावनी
समिति सदस्यों ने इस पूरी कार्रवाई को अलोकतांत्रिक करार दिया है। उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि प्रशासन ने अपना अड़ियल रवैया नहीं छोड़ा और ज़मीन ट्रांसफर के आदेश को तुरंत रद्द नहीं किया गया, तो वे पंचायती राज अधिनियम के तहत कड़े कदम उठाने और सड़कों पर उतरकर संघर्ष करने के लिए विवश होंगे। इस स्थिति में किसी भी तरह के विवाद की सारी जिम्मेदारी जिला प्रशासन की होगी।