Ranchi News: झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने जेएसएससी-सीजीएल परीक्षा और टीडीपीएल द्वारा आयोजित सभी परीक्षाओं को रद्द करने का बड़ा ऐलान किया है। इस घोषणा के बाद आंदोलनकारी छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो ने अपनी भूख हड़ताल खत्म कर दी है। परीक्षाओं के रद्द होने पर राज्य में अब सियासत भी तेज हो गई है।
छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो ने सदर अस्पताल में राज्य सरकार की मंत्री दीपिका पांडे सिंह और इरफान अंसारी की उपस्थिति में अपना अनशन समाप्त किया। राज्य सरकार के इस कदम के बाद जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) की ओर से तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। जेडीयू नेताओं ने फैसले पर कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
मंगलवार 18 अगस्त 2026 को जेडीयू के वरिष्ठ नेता राजीव रंजन ने कहा, “झारखंड सरकार ने आत्मसमर्पण कर दिया है, लेकिन जो चालाकी हेमंत सोरेन ने की है… अभी तक उन्होंने CBI जांच की सिफारिश नहीं मानी है। उन्हें सिफारिश करनी चाहिए…” उन्होंने मामले में निष्पक्ष जांच की मांग को प्रमुखता से उठाया।
राजीव रंजन ने सरकार पर निशाना साधते हुए आगे कहा, “…पूरी दाल ही काली है, अगर आरोप है तो हेमंत सोरेन को आगे बढ़ना चाहिए। हेमंत सोरेन को खुद को बेदाग साबित करने के लिए केंद्रीय एजेंसी को यह जांच सौंपनी चाहिए।” उन्होंने कहा कि बिना केंद्रीय जांच के सच्चाई सामने आना बेहद मुश्किल है।
दूसरी ओर जेडीयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा ने सरकार के इस फैसले का स्वागत किया है। उन्होंने बयान देते हुए कहा, “जो छात्रों के साथ रांची में हुआ वो सब आप लोगों के सामने है… जिस तरह से पुलिस ने छात्रों पर बर्बरता की… जो बात आ रही थी… जिस तरह का एग्जाम में घपला हुआ…”
संजय कुमार झा ने अपनी बात जारी रखते हुए आगे कहा, “…हम तो स्वागत करते हैं फैसले का… हम लोग इस पक्ष में हैं कि जो परीक्षा होती है वो लीकप्रूफ हो। जो छात्र सालों भर मेहनत करते हैं और परीक्षा के बाद लीक का पता चले तो उसको और परिवार को कितना घात लगता है।”
झारखंड सरकार द्वारा परीक्षा रद्द किए जाने के बावजूद राज्य में प्रशासनिक और राजनीतिक तनाव कम नहीं हो रहा है। परीक्षा रद्द होने से वे उम्मीदवार बेहद परेशान हैं, जिनकी नियुक्ति पहले हो चुकी थी और जो विभिन्न पदों पर अपनी सेवाएं दे रहे थे। वे अब स्पष्टता और न्याय की मांग कर रहे हैं।
पूर्व में नियुक्त हुए अभ्यर्थी अपनी नौकरी की सुरक्षा को लेकर प्रोजेक्ट भवन के बाहर धरने पर बैठ गए हैं। इससे यह बात साफ है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मुश्किलें फिलहाल कम नहीं हुई हैं। अब देखना होगा कि धरना दे रहे इन प्रभावित कर्मचारियों की मांगों पर राज्य सरकार क्या नया रुख अपनाती है।