Delhi News: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक अक्टूबर को नई दिल्ली स्थित भारत मंडपम में संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) के शताब्दी समारोह में शिरकत करेंगे। देश की शीर्ष भर्ती एजेंसी के 100 वर्ष पूरे होने पर यह आयोजन होगा। वह सुबह 11 बजे कार्यक्रम को संबोधित करेंगे तथा स्मारक सिक्का और विशेष डाक टिकट जारी करेंगे।
इस ऐतिहासिक मौके पर प्रधानमंत्री एक महत्वपूर्ण पुस्तक ‘100 लैंडमार्क जजमेंट्स- शेपिंग द पॉलिसीज़ ऑफ़ यूपीएससी एंड पब्लिक सर्विस कमीशन्स इन इंडिया’ का विमोचन भी करेंगे। यह कार्यक्रम पिछले वर्ष एक अक्टूबर से चल रहे साल भर लंबे शताब्दी समारोह का औपचारिक समापन करेगा। दो दिवसीय इस आयोजन में कई वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहेंगे।
आयोग की स्थापना और सौ साल का गौरवशाली इतिहास
सम्मेलन में राज्य लोक सेवा आयोगों के सदस्य, बड़े सरकारी अधिकारी और शिक्षाविद शामिल हो रहे हैं। पहले दिन ‘शताब्दी समारोह – मंथन’ का आयोजन हुआ, जिसमें लोक सेवा सुधारों पर चर्चा की गई। यूपीएससी की जड़ें साल 1919 के पहले सरकारी प्रेषण से जुड़ी हैं, जिसने देश में एक स्वतंत्र और स्थायी आयोग की जरूरत बताई थी।
लॉर्ड ली की अध्यक्षता वाले रॉयल कमीशन की 1924 की रिपोर्ट की सिफारिश पर एक अक्टूबर 1926 को पहले लोक सेवा आयोग की स्थापना हुई। सर रॉस बार्कर को इसका पहला अध्यक्ष बनाया गया था। बाद में 1935 के एक्ट के तहत इसे फेडरल कमीशन नाम दिया गया, जो आजादी के बाद यूपीएससी बना।
संवैधानिक प्रावधान और भर्ती आयोग की प्रमुख जिम्मेदारियां
संविधान लागू होने के साथ ही 26 जनवरी 1950 को अनुच्छेद 315 के तहत यूपीएससी को पूर्ण संवैधानिक दर्जा मिला। इस आयोग में वर्तमान समय में एक अध्यक्ष और 10 सदस्य कार्य करते हैं। अनुच्छेद 320 के अनुसार केंद्र सरकार के लिए सिविल सेवा भर्तियों से जुड़े सभी मुख्य मामलों में आयोग से अनिवार्य सलाह लेना जरूरी है।
यूपीएससी मुख्य रूप से ऑल इंडिया सर्विसेज और केंद्रीय ग्रुप ‘ए’ व ग्रुप ‘बी’ सेवाओं के लिए राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाएं आयोजित करता है। इसके अलावा आयोग सीधी भर्ती, अधिकारियों की पदोन्नति, प्रतिनियुक्ति, सेवा नियमों में जरूरी संशोधन और कर्मियों के खिलाफ अनुशासनात्मक मामलों पर सरकार को अपनी स्वतंत्र और निष्पक्ष सलाह देता है।