भारत-नेपाल सीमा पर ‘दसगजा’ और अतिक्रमण की पहचान के लिए ड्रोन सर्वे पर बनी सहमति, तीन साल में पूरा होगा काम

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Lucknow News: भारत और नेपाल अपनी खुली सीमा के नो-मैन्स-लैंड यानी ‘दसगजा’ क्षेत्र का सटीक मैप तैयार करने के लिए आधुनिक ड्रोन तकनीक का इस्तेमाल करेंगे। लखनऊ में आयोजित सर्वे अधिकारियों की 13वीं बैठक में दोनों देशों ने सीमा-पार कब्जे और अतिक्रमण की पहचान के लिए संयुक्त ड्रोन सर्वेक्षण पर औपचारिक सहमति जताई है।

दसगजा पट्टी और सीमा-पार अवैध कब्जों की जांच

दसगजा अंतरराष्ट्रीय सीमा के दोनों तरफ खाली छोड़ी जाने वाली करीब 10-10 गज की बफर पट्टी है। जमीनी स्तर पर इस नो-मैन्स-लैंड में खेती, निर्माण और बस्तियों के बसने से कई जटिलताएं पैदा हो गई हैं। दोनों देशों की टीमें अब हवाई तस्वीरों के जरिए वास्तविक स्थिति का विश्लेषण कर सटीक रिपोर्ट तैयार करेंगी।

हजारों सीमा स्तंभ क्षतिग्रस्त और नदियों का बदलता प्रवाह

करीब 1,880 किलोमीटर लंबी खुली सीमा पर लगाए गए 8,554 खंभों में से 1,325 गायब हैं और लगभग 1,956 बुरी तरह टूट चुके हैं। इसके अलावा नदियों द्वारा मार्ग बदलने के कारण भी बड़ी जमीन एक से दूसरी तरफ चली गई है। ड्रोन की मदद से निर्देशांकों और पुराने 182 स्ट्रिप मैप्स से इसका मिलान होगा।

विवादित क्षेत्रों को अलग रखकर तकनीकी समाधान पर जोर

यह संयुक्त अभियान सितंबर-अक्टूबर से शुरू होकर तीन साल में पूरा होने की उम्मीद है। इस तकनीकी प्रक्रिया से कालापानी और सुस्ता जैसे अनसुलझे विवादित क्षेत्रों को पूरी तरह बाहर रखा गया है। इसका मुख्य उद्देश्य नो-मैन्स-लैंड को अतिक्रमण मुक्त बनाना, पिलर सुधारना और आपसी तकनीकी रिकॉर्ड को साझा रूप से मजबूत करना है।

Desh Raj
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