Kolkata News: पश्चिम बंगाल की दो विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव से पहले सियासी पारा चढ़ गया है। अंदरूनी कलह से जूझ रही तृणमूल कांग्रेस बैकफुट पर दिख रही है। वहीं वामदल और कांग्रेस अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। इस बीच खानपान को लेकर शुरू हुए विवाद ने सत्ताधारी भाजपा को असहज कर दिया है।
राज्य में विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद से ही भोजन और खानपान बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। कोलकाता नगर निगम के स्कूलों में मिड-डे मील की व्यवस्था इस्कॉन को देने और मेन्यू से अंडे हटाने पर भारी विरोध हुआ। इसके बाद शुभेंदु अधिकारी सरकार को अलग योजना के तहत हफ्ते में दो दिन अंडे देने की घोषणा करनी पड़ी।
आगामी दुर्गा पूजा और नवरात्रि के मौके पर यह विवाद और ज्यादा गहरा गया है। हाल ही में विश्व हिंदू परिषद ने पूजा पंडालों के आसपास मांसाहार न बेचने का अनुरोध किया था। विरोध बढ़ने पर विहिप ने सफाई दी, लेकिन इसके तुरंत बाद बाबा बागेश्वर के एक बयान ने इस बहस को और तेज कर दिया।
बाबा बागेश्वर ने बंगाली समुदाय से नवरात्रि के दिनों में मांसाहार छोड़ने का आग्रह किया था। इस बयान का विरोध विपक्षी दलों के साथ भाजपा के कई विधायकों और नेताओं ने भी किया। विवाद बढ़ता देख भाजपा प्रदेश अध्यक्ष शमीक भट्टाचार्य को सार्वजनिक रूप से यह कहना पड़ा कि वे नवमी के दिन मटन खाएंगे।
पश्चिम बंगाल में मांसाहार सिर्फ स्वाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वहां की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपरा का अटूट हिस्सा है। विजयादशमी पर मां दुर्गा के विसर्जन से पहले पूटी या इलिश मछली चढ़ाने की सदियों पुरानी परंपरा है। स्वामी विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस ने भी भोजन की पसंद को कभी भक्ति के आड़े नहीं आने दिया।
भाजपा ने आधिकारिक रूप से लोगों के खानपान पर कोई रोक लगाने की बात नहीं कही है। हालांकि आम जनता हिंदू संगठनों और पार्टी के रुख को एक साथ जोड़कर देख रही है। हॉकरों को हटाने, अन्नपूर्णा योजना में देरी और अब भोजन की आजादी पर छिड़ी यह बहस सरकार के लिए नई राजनीतिक चुनौती बन गई है।