New Delhi News: भारतीय खाने की थाली में अचार का स्थान बेहद खास माना जाता है। भोजन का स्वाद बढ़ाने वाला यह पारंपरिक व्यंजन करीब 3000 साल पुराना है। प्राचीन काल में इसे स्वाद के लिए नहीं, बल्कि सूखे और कठिन मौसम में भोजन को लंबे समय तक सुरक्षित रखने की तकनीक के रूप में शुरू किया गया था।
प्राचीन इतिहास और इब्न बतूता के यात्रा वृतांत में उल्लेख
इतिहास के अनुसार अचार की शुरुआत टिगरिस घाटी में देसी खीरे से हुई थी। प्रसिद्ध मोरक्को यात्री इब्न बतूता ने भी भारत में कच्चे आम को नमक के साथ सुरक्षित रखने का जिक्र किया था। इसके अलावा 1594 के लिंग पुराण में पचास से अधिक प्रकार के पारंपरिक अचारों का विस्तार से विवरण मिलता है।
अचार बनाने की तीन प्रमुख तकनीक और तेल का महत्व
भारत में अचार को मुख्य रूप से तीन तरीकों से तैयार किया जाता है। इसमें सिरका, नमक और तेल का उपयोग शामिल है। देश में फंगस से बचाव और लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए तेल का इस्तेमाल सबसे लोकप्रिय तरीका है। यह तकनीक भोजन को खराब होने से बचाती है।
शाकाहारी से लेकर मांसाहारी तक अचार की अनोखी किस्में
उत्तर भारत में आम, नींबू, आंवला, कटहल और गाजर जैसी सब्जियों के अचार अधिक पसंद किए जाते हैं। वहीं दक्षिण भारत में चिकन, मछली और झींगे के नॉन-वेज अचार बनाए जाते हैं। कर्नाटक के कोडागु क्षेत्र में सूअर के मांस का अचार भी खानपान की पारंपरिक संस्कृति का एक प्रमुख हिस्सा है।