दिवाली पर बिहार में क्यों बनाए जाते हैं मिट्टी के घरौंदे? जानिए कुलहिया-चुकिया और खोई-बताशा की लोक परंपरा

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Patna News: बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में दीपावली के मौके पर मिट्टी के घरौंदे बनाने और भाई को खोई-बताशा खिलाने की प्राचीन लोक परंपरा आज भी जीवंत है। कुंवारी कन्याओं द्वारा बनाए जाने वाले ये छोटे आशियाने सुख-समृद्धि, गृहस्थ जीवन की सीख और पारिवारिक खुशहाली का प्रतीक माने जाते हैं।

दीपावली के पावन अवसर पर जहां दीयों और आतिशबाजी की धूम रहती है, वहीं बिहार के आंचलिक क्षेत्रों में लोक परंपराओं का एक अनूठा रंग देखने को मिलता है। इस दिन घर की बेटियां मिट्टी, गत्ते और रंगों की मदद से दो मंजिला छोटे घरौंदे तैयार करती हैं। इन घरौंदों को फूलों, दीपों और हस्तशिल्प से सजाया जाता है, जो नए घर और नई शुरुआत की मंगलकामना का प्रतिनिधित्व करते हैं।

भगवान राम के स्वागत और गृहस्थ जीवन की सीख से जुड़ा इतिहास

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, 14 वर्ष के वनवास के बाद जब भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे थे, तब अयोध्यावासियों ने दीप प्रज्वलित कर समूची नगरी को सजाया था। इसी स्मृति में घरौंदा बनाकर समृद्धि और शांति की प्रार्थना की जाती है।

पारंपरिक दृष्टिकोण से इसे बालिकाओं के भविष्य के गृहस्थ जीवन के संस्कारों से भी जोड़कर देखा जाता रहा है। खेल-खेल में मिट्टी के घर और रसोई की व्यवस्था सहेजने से बच्चों में सामूहिकता, रचनात्मकता और दायित्वबोध का विकास होता है।

कुलहिया-चुकिया और अन्न समृद्धि का भाव

घरौंदे की सजावट के साथ ही मिट्टी के सूक्ष्म बर्तन भी रखे जाते हैं, जिन्हें स्थानीय बोली में कुलहिया-चुकिया या चरघरवा कहा जाता है। इन बर्तनों में धान का लावा (खोई), बताशे, मखाने और चीनी की मिठाइयां भरी जाती हैं। यह रस्म घर में अन्न-धन के भंडार भरे रहने और रसोई की संपन्नता की कामना का प्रतीक मानी जाती है।

भाई-बहन के स्नेह का प्रतीक है खोई-बताशा खिलाना

दिवाली पूजन के पश्चात अगले दिन (गोवर्धन पूजा या भाई दूज के अवसर पर) बहनें कुलहिया-चुकिया से प्रसाद निकालकर अपने भाइयों को खोई-बताशा खिलाती हैं। यह विधान भाइयों के दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और खुशहाली की कामना से जुड़ा है, जिसके बदले भाई भी बहनों को उपहार और स्नेह भेंट करते हैं। डिजिटल युग में भी यह परंपरा बच्चों को माटी, परिवार और सांस्कृतिक जड़ों से जोड़े रखने का सशक्त माध्यम बनी हुई है।

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