National News: सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक टिप्पणी में कहा है कि देश में घटती प्रजनन दर के कारण स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने के लिए दो से अधिक बच्चे होने पर अयोग्य ठहराने वाले नियमों का औचित्य अब समाप्त हो चुका है। अदालत ने 2003 के ‘जावेद बनाम हरियाणा राज्य’ फैसले पर पुनर्विचार के लिए मामला बड़ी बेंच को भेज दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि स्थानीय निकायों के चुनाव लड़ने के लिए 2 से अधिक बच्चे होने पर अयोग्य ठहराने वाले कानूनों की प्रासंगिकता अब खत्म हो गई है। शीर्ष अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि जनसांख्यिकीय बदलावों के कारण ऐसे प्रतिबंधों के पीछे का मूल तर्क ही अब बेमानी हो चुका है।
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने ‘महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1959’ की धारा 14(1)(j-1) के तहत काकोडा ग्राम पंचायत की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव की अयोग्यता को भी रद कर दिया। मंगला भीमराव को तीसरे बच्चे के जन्म के आधार पर पद से अयोग्य घोषित किया गया था। इस अधिनियम में 13 सितंबर 2000 को हुए संशोधन के जरिए दो से अधिक बच्चे होने पर चुनाव लड़ने पर रोक लगाई गई थी।
प्रजनन दर में गिरावट और बदलती जनसांख्यिकी
अदालत ने कहा कि जब सुप्रीम कोर्ट ने 2003 में ‘जावेद बनाम हरियाणा राज्य’ मामले में ‘दो बच्चों के नियम’ की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा था, तब भारत की कुल प्रजनन दर (TFR) 3 थी। अब यह घटकर 1.9 रह गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि 2.1 की कुल प्रजनन दर को ‘रिप्लेसमेंट रेट’ (प्रतिस्थापन स्तर) कहा जाता है, जो एक पीढ़ी को पूरी तरह से खुद को प्रतिस्थापित करने में सक्षम बनाती है। अदालत ने रेखांकित किया कि भले ही भारत की जनसंख्या वर्तमान में घट नहीं रही है, लेकिन कुल प्रजनन दर का ‘रिप्लेसमेंट रेट’ से नीचे चले जाना जल्द ही एक ऐसे जनसांख्यिकीय बदलाव की ओर ले जाएगा, जिसमें बुजुर्ग आबादी बढ़ेगी और काम करने वाली उम्र के लोगों का अनुपात कम हो जाएगा।
बड़ी बेंच करेगी 2003 के फैसले पर पुनर्विचार
जस्टिस नरसिम्हा ने फैसला सुनाते हुए कहा कि दो से अधिक बच्चे होने पर दंड देने वाले कानूनों की प्रासंगिकता अब खत्म हो चुकी है। इन कानूनों का आधार यानी अत्यधिक जनसंख्या का डर पिछले कुछ दशकों में आए जनसांख्यिकीय बदलावों के चलते समाप्त हो गया है। पीठ ने चेतावनी दी कि यदि इन जनसांख्यिकीय बदलावों पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो देश को इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।
शीर्ष अदालत ने ‘जावेद बनाम हरियाणा राज्य’ (2003) मामले को बड़ी बेंच के पास भेज दिया है, जिसमें तीन जजों की बेंच ने ‘हरियाणा पंचायती राज अधिनियम, 1994’ की संवैधानिक वैधता को सही ठहराया था।
अदालत ने यह भी चिंता व्यक्त की कि यदि ऐसे कानून लागू रहते हैं, तो नागरिकों का एक बड़ा वर्ग बिना किसी ठोस कारण के लोकतांत्रिक और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से बाहर हो जाएगा, जबकि इस नियम का सार्वजनिक पद संभालने की उनकी योग्यता व क्षमता से कोई सीधा संबंध नहीं है।