कैंसर दवाओं पर निजी अस्पतालों की मनमानी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, दस गुना दाम वसूली को बताया खुली लूट

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Delhi News: उच्चतम न्यायालय ने निजी अस्पतालों द्वारा कैंसर की दवाओं पर भारी भरकम मुनाफा कमाने को खुली लूट बताया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि जो दवा खुदरा विक्रेताओं को 2,700 रुपये में मिलती है, उसे मरीजों को 27,000 रुपये में बेचा जाता है। अदालत ने सभी दवाओं पर समान मार्जिन की वकालत की।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ दवाओं के मूल्य नियंत्रण से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। पीठ ने कहा कि निजी अस्पताल किसी को नहीं बख्शते हैं। यहां तक कि बिल चुकाए बिना वे शव तक नहीं ले जाने देते। ऐसे में सरकार को इस व्यवस्था की समीक्षा करनी चाहिए।

अस्पतालों की इन-हाउस फार्मेसी नीति पर केंद्र को निर्देश

अदालत ने कहा कि निजी अस्पताल मरीजों को अपने ही मेडिकल स्टोर से दवाएं खरीदने के लिए मजबूर करते हैं। बाहर से दवा लेने पर वे इलाज की जिम्मेदारी नहीं लेते हैं। पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को इस मुद्दे पर गौर करने का निर्देश दिया, क्योंकि इस व्यवस्था से आम जनता का नुकसान होता है।

पीठ ने सवाल उठाया कि जब औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश के तहत 16 प्रतिशत लाभ तय है, तो यह भारी अंतर क्यों है। न्यायमूर्ति मेहता ने कहा कि अगर कोई मरीज सरकारी योजना में इलाज कराता है, तो उसका बोझ ईमानदार करदाता पर पड़ता है। ऐसे में सभी दवाओं पर केवल 16 प्रतिशत मार्जिन तय होना चाहिए।

उद्योग बन चुके हैं निजी अस्पताल, अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को

सॉलिसिटर जनरल ने माना कि इस समस्या का समाधान जरूरी है और अधिक मुनाफा फार्मा कंपनियों के बजाय निजी अस्पतालों की जेब में जा रहा है। उन्होंने अधिकारियों से चर्चा के लिए दो हफ्ते का समय मांगा। पीठ ने कहा कि निजी अस्पताल अब सेवा नहीं बल्कि उद्योग बन चुके हैं, जिसकी मार जनता झेल रही है।

अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए कहा कि यह मुद्दा समाज के एक बहुत बड़े वर्ग के जीवन और जेब को प्रभावित करता है। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को अपना स्पष्ट जवाब दाखिल करने के लिए समय दिया है। अब इस अहम जनहित याचिका पर अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को होगी।

Desh Raj
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