Bengaluru News: कर्नाटक सरकार ने कैंसर, एंटीबायोटिक्स और मेडिकल उपकरणों की खरीद लागत व एमआरपी में भारी अंतर पकड़ा है। अस्पतालों में कई दवाएं खरीद मूल्य से 50 गुना से ज्यादा कीमत पर बेची जा रही थीं। इस खुलासे के बाद राज्य सरकार ने केंद्र सरकार और एनपीपीए से राष्ट्रीय स्तर पर दखल देने की अपील की है।
अस्पतालों की भारी मुनाफाखोरी पर एफडीए का खुलासा
कर्नाटक के खाद्य सुरक्षा और औषधि प्रशासन ने अस्पतालों के निरीक्षण के दौरान यह गड़बड़ी पकड़ी। कंपनियां अस्पतालों को भारी डिस्काउंट पर दवाएं देती हैं, लेकिन मरीजों से पूरी एमआरपी वसूली जाती है। जांच में 253 ऐसी दवाएं सामने आई हैं, जिनकी लागत और बिक्री मूल्य में चौंकाने वाला अंतर पाया गया है।
जांच में क्रिटिकेयर की गुफिपोल की लागत 86 रुपये और एमआरपी 4,528 रुपये मिली। गुफिसाइक्लिन इंजेक्शन 160 रुपये में खरीदकर 7,110 रुपये में बेचा जा रहा था। वहीं 1,000 रुपये की टैक्सोकेयर 21,617 रुपये, 6,600 रुपये की कैनमैब 57,457 रुपये और 5,850 रुपये की बेवाटस 62,690 रुपये में दर्ज पाई गई।
मेडिकल उपकरणों पर भी मरीजों से भारी वसूली
दवाओं के अलावा मेडिकल उपकरणों में भी यही खेल सामने आया। 44.50 रुपये का नेबुलाइजर मास्क 950 रुपये और 14.75 रुपये का आईवी सेट 295 रुपये में बेचा जा रहा था। स्वास्थ्य मंत्री यू.टी. खादर ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री को पत्र लिखकर इस भारी ओवरबिलिंग पर तत्काल सख्त कदम उठाने का आग्रह किया है।
कर्नाटक ने मांग की है कि मरीजों के बिल में खरीद लागत और एमआरपी दोनों दर्शाना अनिवार्य किया जाए। साथ ही ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर का दायरा बढ़ाने, ट्रेड मार्जिन नियंत्रित करने और 2013 के नियमों में संशोधन का प्रस्ताव रखा है। एफडीए ने 768 जरूरी सामानों की जांच रिपोर्ट केंद्र को सौंपने की तैयारी की है।
प्रशासन ने साफ किया है कि यह जांच अभियान आगे भी कई चरणों में जारी रहेगा। अगले चरण में एंटी-रेट्रोवायरल दवाओं, हाई-जनरेशन एंटीबायोटिक्स और गंभीर बीमारियों के महंगे मेडिकल उपकरणों की पड़ताल की जाएगी। सरकार का कहना है कि स्वास्थ्य बिलिंग में पारदर्शिता लाकर मरीजों को आर्थिक शोषण से बचाना उसकी शीर्ष प्राथमिकता है।