हिमाचल के गोहर में फर्जी रजिस्ट्री का पर्दाफाश, कांग्रेसी नेता से 90 लाख की ठगी और रिश्वत लेते समय हुए थे पटवारी-कानूनगो गिरफ्तार

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Mandi News: हिमाचल में जमीन अब सिर्फ जमीन नहीं रही। वो नोट छापने की मशीन बन गई है। और इस मशीन को चलाता है राजस्व विभाग का वो “सिंडिकेट” जिसके लिए कानून की किताब, कोर्ट का आदेश और सरकारी रिकॉर्ड सबकी कीमत तय है। मंडी जिले के गोहर में सामने आया मामला इसी सड़ांध का सबसे ताजा और वीभत्स उदाहरण है।

यहां प्रॉपर्टी डीलरों और राजस्व कर्मियों के गठजोड़ ने सत्ता दल के एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता को ही 90 लाख रुपये का चूना लगा दिया। जमीन खरीदी गई, रजिस्ट्री भी हो गई, लेकिन नाम इंद्राज यानी इंतकाल होने से पहले ही जालसाजी का पर्दाफाश हो गया। और जब सिंडिकेट ने इंतकाल के बदले 2 लाख रिश्वत मांगी, तो विजिलेंस ने तीनों को रंगे हाथों दबोच लिया।

साजिश गोहर के मुहाल ओयरी क्षेत्र में रची गई। खसरा नंबर 724 की 6 बीघा 1 बिस्वा जमीन को डीलरों ने “बिल्कुल साफ, वे-विवाद और सरकारी रिकॉर्ड में क्लियर” बताकर 90 लाख में बेचा। 25 फरवरी 2026 को तहसील में रजिस्ट्री नंबर 199/226 धड़ल्ले से हो गई। इंतकाल के लिए मुख्तार पूर्ण चंद को आगे किया गया।

यहीं से सिंडिकेट का असली खेल शुरू हुआ

कमाई की 3 सीढ़ी: टालो, डराओ, ऐंठो:-
राजस्व विभाग के इस संगठित गिरोह का मॉडल बेहद सरल है।

पहली सीढ़ी – टालना: पटवारी साहब ने महीनों तक फाइल लटकाई। “आज आना, कल आना”।

दूसरी सीढ़ी – डराना: जब काम नहीं बना तो कानूनगो साहब ने कोर्ट के स्टे का हवाला देकर कहा “मामला पेचीदा है, फंस जाओगे”।

तीसरी सीढ़ी – ऐंठना: आखिर में सीधी डिमांड – “2 लाख दो तभी इंतकाल होगा”।

पहले 90 लाख में विवादित जमीन बेचो, फिर उसी को वैध कराने के नाम पर 2 लाख और निकालो। यही है सिंडिकेट की कमाई का फार्मूला।

रिकॉर्ड और अदालत, दोनों की धज्जियां

सबसे खतरनाक खुलासा जमाबंदी से हुआ। मौजा ओयरी की इस जमीन के खिलाफ बिक्री के 12 लाल इंद्राज पहले से दर्ज थे, यानी ये जमीन पहले ही 12 बार बिक चुकी है। इसके बावजूद 13वीं बार जिला कांग्रेसी नेता को बेच दी गई।

इससे भी गंभीर बात – सिविल जज गोहर ने CMA No. 292/2024 में 18.06.2025 को इस जमीन पर स्पष्ट स्टे दे रखा था। रोजनामचा 410 में ये दर्ज भी था। कानून कहता है स्टे वाली जमीन की रजिस्ट्री नहीं हो सकती। फिर भी हो गई।

इसका सीधा मतलब है – गोहर तहसील में कोर्ट का आदेश, जमाबंदी और कानून तीनों की कोई अहमियत नहीं। अहमियत सिर्फ “सेटिंग” की है।

विजिलेंस की चोट और सिस्टम की शर्म

13 जुलाई 2026 को पीड़ित पक्ष ने विजिलेंस मंडी से संपर्क किया। डीएसपी प्रियंक गुप्ता के नेतृत्व में टीम ने जाल बिछा कर सबूत जुटाए। उसी दिन पटवारी और कानूनगो ने 1 लाख की पहली किस्त लेते समय सहायक ललित कुमार के साथ रंगे हाथों पकड़े गए। जांच अधिकारी का कहना है कि मामले में तहसील कार्यलय से रिकार्ड एकत्रित किया जा रहा है।

सबसे शर्मनाक दृश्य – कानूनगो बंशी लाल 31 जुलाई को रिटायर होने वाले थे। उन्हें रिटायरमेंट से 8 दिन पहले हथकड़ी मिली। विभाग ने दोनों को निलंबित कर दिया है।

राजनीतिक और प्रशासनिक सवाल

इस मामले ने दो बड़े सवाल खड़े किए हैं। जब सत्ता दल का वरिष्ठ नेता भी राजस्व सिंडिकेट से नहीं बच सका, तो आम किसान, विधवा और गरीब की क्या औकात? कांग्रेस “जीरो टॉलरेंस” की बात कर रही है, जबकि विपक्ष “किसके इशारे पर रजिस्ट्री हुई” पूछ रहा है। लेकिन सच ये है कि भू-माफिया का कोई दल नहीं होता। उसे सिर्फ संरक्षण चाहिए।

दूसरा रजिस्ट्री करने से पहले जमाबंदी और कोर्ट के आदेश चेक करने की जिम्मेदारी किसकी थी? अर्जी नवीस, रजिस्ट्री क्लर्क और तहसीलदार की भूमिका की जांच क्यों नहीं? विजिलेंस अब पूर्व तहसीलदार के कार्यकाल की फाइलें खंगाल रही है। अर्जी नवीसों और डीलरों की चेन तोड़ी जा रही है। गोहर का ये मामला एक चेतावनी है। अगर समय रहते राजस्व रिकॉर्ड का पूर्ण डिजिटलीकरण, कोर्ट के स्टे का ऑटो-अलर्ट सिस्टम और रजिस्ट्री से पहले बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन नहीं हुआ, तो कल कोई और 90 लाख गंवाएगा।

90 लाख की जमीन शायद हाथ न लगे, लेकिन इस रेड से इतना तो तय है कि नाम इंद्राज से पहले जालसाजी पकड़ ली जाए तो सिंडिकेट को भी सलाखों के पीछे जाना पड़ता है।

अब देखना है सरकार इस “कमाई के जाल” को जड़ से उखाड़ती है, या फिर निलंबन करके फाइल बंद कर देती है। क्योंकि अगर कोर्ट का स्टे भी बाजार में बिकने लगा, तो फिर कानून के दरबार का कैसे विश्वास किया जा सकता है।

साभार: ख्याली राम भारद्वाज

Right News Desk
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लॉ और पत्रकारिता स्नातक, पत्रकारिता में 11 वर्ष का अनुभव

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