National News: 2 अक्टूबर का दिन देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की 122वीं जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। उनका पूरा जीवन सादगी, शुचिता और देशभक्ति की अद्वितीय मिसाल रहा है। ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा देने वाले शास्त्री जी विनम्र स्वभाव के साथ बेहद मजबूत इरादों वाले राजनेता थे।
अत्यधिक अभावों और गरीबी में बीता प्रारंभिक जीवन
शास्त्री जी का जन्म 1904 में उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में हुआ था। जब वे महज डेढ़ वर्ष के थे, तभी शिक्षक पिता का साया सिर से उठ गया। पिता के निधन के बाद परिवार गंभीर आर्थिक तंगी से जूझा। प्राथमिक शिक्षा के दौरान नाव का किराया न होने पर वे रोज नदी तैरकर स्कूल जाते थे।
तमाम अभावों के बावजूद उन्होंने पढ़ाई जारी रखी और काशी विद्यापीठ से स्नातक किया। यहीं उन्हें ‘शास्त्री’ की उपाधि मिली, जिसे उन्होंने अपने नाम के साथ जोड़ा। सामाजिक समानता का संदेश देने और जातिगत भेदभाव को मिटाने के उद्देश्य से उन्होंने अपने पैतृक उपनाम श्रीवास्तव का हमेशा के लिए त्याग कर दिया।
स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका और नैतिक राजनीति
महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित होकर 16 वर्ष की उम्र में उन्होंने पढ़ाई छोड़कर असहयोग आंदोलन का रुख किया। बाद में नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय रहने के कारण उन्हें नौ साल जेल काटनी पड़ी। जेल में उन्होंने दर्शनशास्त्र और समाजशास्त्र का अध्ययन किया और कुशल रणनीतिकार बने।
आजादी के बाद वे उत्तर प्रदेश के गृह और परिवहन मंत्री बने। इसके बाद वे केंद्रीय रेल मंत्री बने। अपने कार्यकाल में एक गंभीर रेल दुर्घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने तत्काल पद से इस्तीफा दे दिया। उनका यह निर्णय भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में राजनीतिक शुचिता और उच्च नैतिक मूल्यों का अनुपम उदाहरण बन गया।
प्रधानमंत्री के रूप में युद्ध का नेतृत्व और क्रांति की नींव
पंडित जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद वे देश के दूसरे प्रधानमंत्री बने। अपने 19 महीने के कार्यकाल में उन्होंने 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में सेना का मनोबल बढ़ाया। गंभीर अन्न संकट के समय उन्होंने देशवासियों से एक वक्त उपवास की अपील की, जिसकी शुरुआत उन्होंने खुद अपने घर से की थी।
उन्होंने देश में हरित क्रांति और श्वेत क्रांति की मजबूत नींव रखी और जय जवान, जय किसान का अमर नारा दिया। 11 जनवरी 1966 को ताशकंद समझौते पर हस्ताक्षर के बाद उज्बेकिस्तान में संदिग्ध परिस्थितियों में 61 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया, जिसे लेकर आज भी सवाल उठते हैं।