काशी विश्वनाथ मंदिर के संरक्षण को लेकर IIT मद्रास की जांच पूरी, पत्थरों और स्वर्ण पत्रों की सुरक्षा पर 20 दिन में आएगी रिपोर्ट

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Varanasi News: वाराणसी स्थित श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के ऐतिहासिक स्थापत्य को सुरक्षित रखने के लिए आईआईटी मद्रास की टीम ने प्राथमिक जांच पूरी कर ली है। विशेषज्ञ दल ने मंदिर से पत्थर और मिट्टी के नमूने एकत्र किए हैं, जिनकी वैज्ञानिक जांच के आधार पर लगभग 20 दिनों में संरक्षण रिपोर्ट सौंपी जाएगी।

वाराणसी में 250 वर्ष पुराने श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के मूल स्थापत्य और ऐतिहासिक स्वरूप को सुरक्षित रखने के लिए आईआईटी मद्रास के विशेषज्ञों ने जमीनी जांच पूरी कर ली है। विशेषज्ञ दल ने मंदिर परिसर का विस्तृत निरीक्षण किया और अलग-अलग हिस्सों से पत्थर तथा मिट्टी के नमूने एकत्र किए हैं। इन सभी नमूनों को प्रयोगशाला में वैज्ञानिक विश्लेषण और परीक्षण के लिए भेजा गया है। परीक्षण पूरा होने के बाद टीम एक बार फिर काशी पहुंचेगी।

20 दिनों में सौंपी जाएगी प्रारंभिक वैज्ञानिक रिपोर्ट

विशेषज्ञों की यह टीम लगभग 20 दिनों के भीतर मंदिर प्रशासन को अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंप सकती है। इस रिपोर्ट में मुख्य रूप से मंदिर के पत्थरों में आ रही दरारों, उनके क्षरण, कमजोर होने और जगह-जगह से ढीले पड़ रहे स्वर्ण पत्रों के कारणों का वैज्ञानिक विश्लेषण किया जाएगा। इसके साथ ही इन समस्याओं के स्थायी तकनीकी और वैज्ञानिक समाधान के उपाय भी सुझाए जाएंगे।

महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने कराया था वर्तमान स्वरूप का निर्माण

श्री काशी विश्वनाथ मंदिर का वर्तमान ढांचा ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टि से बेहद संवेदनशील है। इसका निर्माण इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने वर्ष 1777 से 1780 के मध्य करवाया था। मंदिर के निर्माण में मुख्य रूप से चुनार के गुलाबी बलुआ पत्थर का प्रयोग हुआ है। ढाई सदियों के प्राकृतिक प्रभाव, मौसमी बदलाव और समय के साथ इन पत्थरों में क्षरण की आशंका को देखते हुए मंदिर प्रशासन ने उच्च तकनीकी विशेषज्ञों की सहायता ली है।

मूल स्वरूप को बिना नुकसान पहुंचाए होगा संरक्षण

आईआईटी मद्रास की टीम अपनी रिपोर्ट में यह स्पष्ट करेगी कि मंदिर के मूल स्वरूप और स्थापत्य से किसी भी तरह की छेड़छाड़ किए बिना पत्थरों को रासायनिक व भौतिक रूप से कैसे मजबूत रखा जाए। इसके अलावा, मंदिर के शिखर से गिरे स्वर्ण कलश को दोबारा पूरी मजबूती और सुरक्षा के साथ स्थापित करने की वैज्ञानिक कार्ययोजना भी दी जाएगी। इस रिपोर्ट के आधार पर ही विश्वनाथ मंदिर के दीर्घकालिक संरक्षण की अंतिम रूपरेखा तय होगी।

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