भारत में बुरी तरह फ्लॉप रहीं ये 5 बहुचर्चित कारें, गलत रणनीति और कमजोर सेफ्टी ने बिगाड़ा खेल

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New Delhi News: भारतीय ऑटोमोबाइल बाजार में गलत पोजिशनिंग, बेमेल डिजाइन और कमजोर सुरक्षा मानकों के कारण कई चर्चित कारें विफल साबित हुई हैं। इनमें टाटा नैनो, डैटसन गो, महिंद्रा क्वांतो, शेवरले एंजॉय और निसान टेरानो जैसे प्रमुख मॉडल शामिल हैं। भारी निवेश और प्रचार के बावजूद ये गाड़ियां खरीदारों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर सकीं।

भारतीय ऑटोमोबाइल बाजार दुनिया के सबसे प्रतिस्पर्धी और चुनौतीपूर्ण बाजारों में से एक माना जाता है। यहां किसी भी वाहन की सफलता केवल बड़े ब्रांड नाम या आकर्षक प्रचार अभियानों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि ग्राहकों की सामाजिक प्रतिष्ठा, व्यावहारिक उपयोगिता और पैसे के सही मूल्य (वैल्यू फॉर मनी) से तय होती है। भारत में कार को केवल आवागमन का साधन नहीं, बल्कि पारिवारिक समृद्धि और सामाजिक स्थिति का प्रतीक भी माना जाता है। इसी नब्ज को न पहचान पाने के कारण वैश्विक स्तर पर सफल रही कंपनियों की कई बहुचर्चित कारें भी भारत में बुरी तरह विफल रहीं।

गलत बाजार रणनीति, असंतुलित डिजाइन, कमजोर बिल्ड क्वालिटी और सुरक्षा संबंधी कमियों के चलते बाजार से बाहर हुईं 5 प्रमुख कारों का विश्लेषण इस प्रकार है:

1. टाटा नैनो (Tata Nano)

टाटा मोटर्स ने वर्ष 2009 में करीब 1 लाख रुपये की शुरुआती एक्स-शोरूम कीमत पर नैनो को दुनिया की सबसे किफायती कार के रूप में पेश किया था। इसका कॉम्पैक्ट अंडाकार डिजाइन शहरों के भारी ट्रैफिक और दोपहिया वाहन चालकों को चार पहिया में अपग्रेड करने के उद्देश्य से तैयार किया गया था। इसमें 624 सीसी का रियर-माउंटेड ट्विन-सिलेंडर पेट्रोल इंजन और पर्याप्त केबिन स्पेस दिया गया था।

हालांकि, कंपनी द्वारा इसे ‘सबसे सस्ती कार’ के रूप में प्रचारित करना ही इसकी विफलता का सबसे बड़ा कारण बन गया। भारत में कार की खरीद सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़ी होने के कारण लोग ‘सस्ती कार’ का तमगा लेने से बचने लगे। इसके अलावा शुरुआती दौर में आग लगने की कुछ घटनाओं और सुरक्षा चिंताओं ने इसकी बिक्री को गहरा झटका दिया।

2. डैटसन गो (Datsun GO)

निसान ने वर्ष 2014 में अपने ऐतिहासिक सब-ब्रांड डैटसन को भारतीय बाजार में पुनर्जीवित करते हुए लगभग 3.12 लाख रुपये की शुरुआती कीमत पर डैटसन गो हैचबैक उतारी थी। स्पोर्टी डिजाइन, हेक्सागोनल ग्रिल, 1.2-लीटर पेट्रोल इंजन और अच्छे माइलेज के बावजूद अत्यधिक लागत कटौती (कॉस्ट-कटिंग) ने इसका आकर्षण खत्म कर दिया।

गाड़ी के केबिन में कवर्ड ग्लवबॉक्स तक मौजूद नहीं था और बॉडी पैनल्स बेहद हल्के थे। ग्लोबल एनसीएपी (Global NCAP) क्रैश टेस्ट में इसे शून्य-स्टार सुरक्षा रेटिंग मिली, जिसने इसके कमजोर ढांचे को उजागर कर दिया। मारुति सुजुकी और हुंडई के कड़े मुकाबले के सामने यह मॉडल अपनी पकड़ नहीं बना सका।

3. महिंद्रा क्वांतो (Mahindra Quanto)

महिंद्रा ने 2012 में 4-मीटर से छोटी कारों पर मिलने वाले कर लाभ का फायदा उठाने के लिए कॉम्पैक्ट एसयूवी क्वांतो पेश की, जिसकी शुरुआती कीमत लगभग 5.99 लाख रुपये थी। इसका अगला हिस्सा महिंद्रा जाइलो (Xylo) से मिलता-जुलता था, जबकि पिछले हिस्से को अचानक काट दिया गया था। इस बेमेल बॉक्स-कट डिजाइन के चलते वाहन का लुक काफी अजीब नजर आता था।

इसमें 1.5-लीटर एमहॉक ट्विन-टर्बो डीजल इंजन और 7-सीटर लेआउट (पीछे दो जंप सीटें) दिया गया था। भारी लैडर-फ्रेम चेसिस और अधिक ऊंचाई के कारण इसमें अत्यधिक बॉडी-रोल और अस्थिर राइड क्वालिटी की गंभीर समस्या थी, जिसके चलते ग्राहकों ने इसे नकार दिया।

4. शेवरले एंजॉय (Chevrolet Enjoy)

जनरल मोटर्स ने 2013 में बजट एमपीवी वर्ग में मारुति अर्टिगा को चुनौती देने के लिए शेवरले एंजॉय को लगभग 5.49 लाख रुपये की आक्रामक कीमत पर लॉन्च किया था। चीनी साझेदार एसएआईसी (SAIC) के प्लेटफॉर्म पर आधारित इसका फ्लैट डिजाइन किसी कमर्शियल वैन जैसा दिखाई देता था।

यद्यपि इसमें 7 और 8-सीटर विकल्प, 1.3-लीटर डीजल इंजन और बड़ा केबिन उपलब्ध था, लेकिन घटिया प्लास्टिक क्वालिटी, केबिन में तेज शोर और कमजोर क्रैश सुरक्षा ने खरीदारों को निराश किया। ग्लोबल एनसीएपी में शून्य स्टार रेटिंग और बेहद कम रीसेल वैल्यू के कारण यह मॉडल टिक नहीं पाया।

5. निसान टेरानो (Nissan Terrano)

रेनो-निसान गठबंधन के तहत रेनो डस्टर की भारी सफलता को देखते हुए निसान ने 2013 में टेरानो को लगभग 9.59 लाख रुपये की शुरुआती कीमत पर बाजार में उतारा था। हनीकॉम्ब ग्रिल, स्लीक हेडलैम्प्स और मस्कुलर स्टांस के साथ यह देखने में डस्टर से कहीं अधिक प्रीमियम थी। 1.5-लीटर डीसीआई डीजल इंजन के साथ इसका सस्पेंशन और राइड हैंडलिंग भी शानदार थी।

इसके बावजूद, बिना किसी बड़े तकनीकी या आंतरिक बदलाव के कंपनी ने इसे डस्टर के मुकाबले करीब 1 लाख रुपये अधिक महंगा रखा। ग्राहकों को वही इंजन और केबिन अतिरिक्त कीमत पर खरीदना फायदे का सौदा नहीं लगा। साथ ही निसान का सीमित सर्विस नेटवर्क भी इसकी बिक्री में बड़ी रुकावट बना।

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