Roorkee News: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रुड़की के शोधकर्ताओं के नए अध्ययन में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। भविष्य में भारत में मानसून के दौरान बारिश वाले कुल दिनों में कमी आ सकती है, लेकिन जब भी बारिश होगी वह अत्यधिक तेज और भीषण होगी। इससे बाढ़ और जलभराव का खतरा बढ़ेगा।
अध्ययन के मुताबिक कम समय में बहुत अधिक बारिश होने से शहरों के नाले ओवरफ्लो हो सकते हैं और नदियों का जलस्तर तेजी से बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में किसानों और आपदा प्रबंधन टीमों को बचाव कार्य और तैयारी के लिए बेहद कम समय मिलेगा, जिससे नुकसान की आशंका काफी अधिक रहेगी।
एडवांस्ड तकनीक और क्लाइमेट मॉडल्स का उपयोग
आईआईटी रुड़की की टीम ने 13 ग्लोबल क्लाइमेट मॉडल और एडवांस्ड सांख्यिकीय तकनीक का इस्तेमाल किया है। इस मॉडल में बारिश और तापमान के आपसी संबंध को बनाए रखते हुए आंकड़े तैयार किए गए हैं। इससे बाढ़ की सटीक भविष्यवाणी, सूखे की निगरानी, खेती और इंफ्रास्ट्रक्चर प्लानिंग में काफी मदद मिलेगी।
रिसर्च के अनुसार ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ते उत्सर्जन से इस सदी के अंत तक भारी बारिश वाले दिनों की हिस्सेदारी 25% से 40% तक बढ़ सकती है। यह खतरनाक ट्रेंड पश्चिमी, मध्य और पूर्वी भारत में तेजी से उभरेगा। सदी के दूसरे हिस्से में यह मौसमी जोखिम और अधिक विकराल रूप ले सकता है।
दिन के मुकाबले तेजी से गर्म हो रही हैं रातें
स्टडी में पाया गया कि उत्तर, पश्चिम और मध्य भारत में दिन के मुकाबले रात का न्यूनतम तापमान ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है। एरोसोल प्रदूषण और वातावरण में मौजूद धुंध सूरज डूबने के बाद गर्मी को रोककर रखती है। इसके कारण भारत का मौसम अब पहले से कहीं अधिक अनिश्चित हो रहा है।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि पुराने औसत मानसून के आधार पर बने ड्रेनेज सिस्टम और जलाशय प्रबंधन के तरीकों को तुरंत बदलना होगा। भविष्य में उतनी ही सालाना बारिश बहुत कम समय में जोरदार स्पेल के रूप में गिरने की संभावना है, जिसके लिए मजबूत बुनियादी ढांचे की सख्त जरूरत है।