New Delhi News: सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस संजय करोल अपने पद से सेवानिवृत्त हो गए हैं। विदाई समारोह में उन्होंने कहा कि जज भगवान नहीं होते और हर फैसला सही होना मुमकिन नहीं है। उन्होंने न्यायिक प्रक्रिया में विनम्रता, संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण को बेहद जरूरी बताया।
न्यायिक प्रक्रिया में संवेदनशीलता और विनम्रता की अहमियत
जस्टिस करोल ने करीब चार दशक के कानूनी सफर का जिक्र करते हुए कहा कि एक जज को केवल कानूनी पक्ष ही नहीं, बल्कि याचिकाकर्ता के पीछे मौजूद इंसान की पीड़ा समझनी चाहिए। उन्होंने कहा कि याचिका सिर्फ तथ्य बताती है, लेकिन व्यक्ति के वास्तविक दर्द को अदालत को महसूस करना होता है।
उन्होंने 1996 में सुप्रीम कोर्ट के कोर्टरूम नंबर एक में अपनी पहली यात्रा को याद किया। जस्टिस करोल ने कहा कि अदालत की ऊंचाई केवल सत्ता का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह जिम्मेदारी का अहसास कराती है। उन्होंने कहा कि आम नागरिक के अटूट विश्वास में ही सर्वोच्च अदालत का असली महत्व छिपा है।
सुलभ न्याय और संविधान के मूल कर्तव्य पर जोर
विदाई संबोधन में जस्टिस करोल ने उन नागरिकों की चिंता जताई जो दूरी, महंगे खर्च या भय की वजह से अदालतों तक नहीं पहुंच पाते। उन्होंने कहा कि कानून के शासन को धर्म यानी कर्तव्य के रूप में समझा जाना चाहिए, जिससे अंतिम व्यक्ति तक निष्पक्ष न्याय पहुंच सके।
जस्टिस करोल ने हिमाचल प्रदेश से वकालत शुरू कर विभिन्न उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश और फिर शीर्ष अदालत तक का सफर तय किया। शनिवार को आयोजित विदाई समारोह में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और बार एसोसिएशन के कई वरिष्ठ पदाधिकारी मौजूद रहे।