Uttarakhand News: देवभूमि उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति में खुदेड़ लोकगीत का एक विशेष और भावनात्मक स्थान है। यह पारंपरिक लोकगीत पहाड़ों की विवाहित बेटियों यानी ध्याणी द्वारा अपने मायके की याद और विरह की पीड़ा व्यक्त करने के लिए गाया जाता है। यह दर्द भरा सुर यहां की संस्कृति में रचा-बसा है।
मायके से बिछड़ने और अकेलेपन की मार्मिक अभिव्यक्ति
स्थानीय बोली में खुदेड़ शब्द का सीधा अर्थ किसी अपने से बिछड़ जाना या दूर होना होता है। शादी के बाद ससुराल गई नवविवाहित बेटियां जब मायके से अलग होती हैं, तो मन की तड़प इस गीत के जरिए बाहर आती है। यह गीत उन बहुओं के अकेलेपन को भी बयां करता है।
रोजमर्रा के काम निपटाते हुए गुनगुनाती हैं महिलाएं
पहाड़ों में महिलाएं दुख जताने के लिए अलग से विलाप नहीं करती हैं। वे रोजमर्रा की दिनचर्या में जंगल से लकड़ी काटते समय या खेतों में काम करते हुए अपनी सहेलियों के साथ खुदेड़ गुनगुनाती हैं। प्रकृति के तत्वों जैसे पहाड़, हवा, पेड़ और बादलों को वे अपना संदेशवाहक मानती हैं।
इन पारंपरिक गीतों की गायन गति काफी धीमी होती है और इनकी बनावट बाजूबंद शैली से मिलती-जुलती है। बाजूबंद में जहां प्रियतम से विरह का वर्णन होता है, वहीं खुदेड़ केवल मायके की याद से जुड़ा है। आधुनिक डिजिटल दौर में यह अनूठी गायन परंपरा धीरे-धीरे कम होती जा रही है।