Islamabad News: पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने दीपावली पर पाकिस्तान और दुनियाभर के हिंदू समुदाय को बधाई दी है। उन्होंने दिवाली को नफरत के अंधकार पर रोशनी की जीत बताते हुए अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा का संकल्प दोहराया। हालांकि, पाकिस्तान में हिंदू लड़कियों के जबरन धर्म परिवर्तन, घटती आबादी और सुरक्षा चुनौतियों को लेकर गंभीर सवाल बने हुए हैं।
दीपावली के अवसर पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने देश और दुनिया भर के हिंदू समुदाय को बधाई दी है। उन्होंने अपने संदेश में दिवाली को नफरत, असहिष्णुता और निराशा के अंधकार पर रोशनी की जीत का प्रतीक बताया। प्रधानमंत्री ने कहा कि रोशनी का यह पर्व सामाजिक जीवन में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और भाईचारे का गहरा संदेश देता है।
प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा जारी बयान में शहबाज शरीफ ने कहा कि पाकिस्तान का हिंदू समुदाय देश के ताने-बाने का अभिन्न हिस्सा है और देश के सामाजिक, सांस्कृतिक तथा आर्थिक विकास में इसका योगदान सराहनीय है। उन्होंने संविधान का हवाला देते हुए कहा कि सरकार सभी नागरिकों के धार्मिक और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
क्या कहते हैं पाकिस्तान की जनगणना के आंकड़े
एक तरफ जहां प्रधानमंत्री स्तर पर सौहार्द के दावे किए जा रहे हैं, वहीं आधिकारिक आंकड़े दूसरा पहलू भी सामने लाते हैं। पाकिस्तान की 2023 की जनगणना के अनुसार, देश में हिंदू समुदाय की आबादी करीब 38.67 लाख दर्ज की गई थी। वर्ष 2017 में यह संख्या लगभग 35.95 लाख थी। हालांकि संख्या के स्तर पर हल्की बढ़ोतरी दिखती है, लेकिन देश की कुल आबादी में हिंदुओं की हिस्सेदारी 1.73 प्रतिशत से घटकर 1.61 प्रतिशत पर आ गई है।
जमीनी स्तर पर सुरक्षा और मानवाधिकार की चुनौतियां
आंकड़ों के अलावा पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय की सुरक्षा को लेकर लगातार चिंताएं उठती रही हैं। पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग (एचआरसीपी) ने भी अपनी रिपोर्टों में हिंदू और ईसाई समुदाय की महिलाओं और नाबालिग लड़कियों के अपहरण, जबरन धर्म परिवर्तन तथा कम उम्र में निकाह जैसे मामलों पर गंभीर चिंता जताई है। इसके अलावा ऐतिहासिक मंदिरों पर हमलों और तोड़फोड़ की घटनाएं भी सामने आती रही हैं।
विशेष रूप से सिंध प्रांत से असुरक्षा, सामाजिक भेदभाव और आर्थिक तंगी के कारण हिंदू परिवारों के पलायन की खबरें लगातार सामने आती रही हैं। जानकारों का मानना है कि औपचारिक बयानों और शुभकामना संदेशों से अलग, जमीनी स्तर पर अल्पसंख्यकों को बराबरी, सुरक्षा और भयमुक्त माहौल देना ही वास्तविक सुधार की कसौटी है।