New Delhi News: मुगल इतिहास में अकबर से लेकर शाहजहां तक दीपावली मनाने के प्रमाण मिलते हैं, लेकिन औरंगजेब के शासन में स्थिति बदल गई। ऐतिहासिक दस्तावेजों के मुताबिक औरंगजेब ने 1665 और 1667 में फरमान जारी कर बाजारों में रोशनी करने और आतिशबाजी पर रोक लगाई थी। हालांकि, इतिहासकारों के अनुसार निजी तौर पर घरों में दीये जलाने पर सीधा प्रतिबंध नहीं था।
मुगल काल में अकबर के समय दीपावली का पर्व बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता था। जहांगीर और शाहजहां के दौर में भी दरबारी परंपराओं के तहत इस त्योहार को मनाने के ऐतिहासिक संदर्भ मिलते हैं। हालांकि, औरंगजेब के गद्दी संभालने के बाद नीतियों में बड़ा बदलाव आया। औरंगजेब ने अपने शासनकाल में सार्वजनिक आयोजनों, बाजारों की सजावट और आतिशबाजी पर सख्त पाबंदियां लगाते हुए शाही फरमान जारी किए थे।
1665 और 1667 के शाही फरमानों में क्या था?
गुजरात के इतिहास पर आधारित फारसी ग्रंथ ‘मिरात-ए-अहमदी’ के पृष्ठ संख्या 276 के अनुसार, औरंगजेब ने 22 नवंबर 1665 को एक आदेश जारी किया था। इसमें गुजरात के सूबेदार को निर्देश दिया गया था कि अहमदाबाद और गुजरात के परगनों में दीपावली के अवसर पर बाजारों में रोशनी न की जाए। हालांकि, इस फरमान में लोगों को अपने घरों के भीतर दीये जलाने से रोकने का कोई उल्लेख नहीं था।
इसके बाद 9 अप्रैल 1667 को दूसरा आदेश जारी हुआ, जो मुगल दरबार के आधिकारिक दैनिक रिकॉर्ड ‘अखबारात-ए-दरबार-ए-मुअल्ला’ में दर्ज है। इस आदेश के तहत अधिकारी जुमदत-उल-मुल्क को साम्राज्य के सभी सूबों में आतिशबाजी पर रोक लगाने का निर्देश दिया गया। दिल्ली में कोतवाल फौलाद खान को आदेश दिया गया कि वह शहर में मुनादी (ढोल पिटवाकर) कराएं ताकि कोई भी आतिशबाजी न करे। यह प्रतिबंध मुख्य रूप से पटाखों और आतिशबाजी पर केंद्रित था, न कि पूरे त्योहार पर, लेकिन आतिशबाजी दिवाली का अभिन्न हिस्सा होने के कारण इसका व्यापक प्रभाव पड़ा।
धार्मिक नीतियों में बदलाव और पाबंदियों का दौर
इतिहासकारों का विश्लेषण है कि औरंगजेब ने अपने शासन में इस्लामी कानूनों और सिद्धांतों को सख्ती से लागू करने पर जोर दिया। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के शोध मंच ‘मानस’ (MANAS) के शोध संदर्भों के अनुसार, 1668 में हिंदू धार्मिक मेलों पर पाबंदी लगाई गई और 1669 में मंदिरों के नए निर्माण तथा पुराने मंदिरों की मरम्मत पर रोक के आदेश दिए गए। इसी दौर में अकबर के समय से चली आ रही ‘झरोखा दर्शन’ की परंपरा भी समाप्त कर दी गई, जबकि 1679 में गैर-मुस्लिमों पर दोबारा ‘जजिया’ कर लागू किया गया।
शोधकर्ता अताउल्लाह की थीसिस ‘द सिटी ऑफ दिल्ली ड्यूरिंग 18th सेंचुरी’ के संदर्भों से स्पष्ट होता है कि इन शाही फरमानों में सीधे तौर पर दीपावली शब्द का प्रयोग करने के बजाय सार्वजनिक रोशनी और पटाखों पर रोक की बात कही गई थी। इससे सार्वजनिक उत्सव प्रभावित हुए, लेकिन आम नागरिकों द्वारा अपने घरों में पारंपरिक रूप से त्योहार मनाने पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं था।