Mandi News: हिमाचल प्रदेश के मंडी में न्यायिक दंडाधिकारी (प्रथम श्रेणी) कोर्ट तीन ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ा रुख अपनाया है। 200 रुपये जुर्माने वाले वर्ष 2007 के एक मामूली मामले में पुलिस द्वारा 12 साल की देरी से पेश किए गए चालान को खारिज करते हुए कोर्ट ने आरोपित अशोक को बरी कर दिया।
यह मामला बल्ह थाना क्षेत्र का है, जहां 4 फरवरी 2007 को पुलिस ने अशोक के खिलाफ आईपीसी की धारा 283 के तहत सार्वजनिक मार्ग में बाधा डालने का केस दर्ज किया था। नियम के अनुसार इस धारा में अधिकतम 200 रुपये के जुर्माने का ही प्रावधान है।
अदालत की सुनवाई में सामने आया कि यह फाइल कई वर्षों तक ग्राम पंचायत, नगर परिषद नेरचौक और पुलिस थाने के बीच कागजी कार्रवाई में उलझी रही। पुलिस ने 12 वर्ष से अधिक विलंब के बाद चालान पेश किया, लेकिन देरी को माफ कराने के लिए कोई आवेदन प्रस्तुत नहीं किया।
न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 468(2)(ए) के तहत केवल जुर्माने से जुड़े मामलों में संज्ञान लेने की समय-सीमा मात्र छह महीने होती है। यह मामला कानूनन काफी समय पहले ही समय-सीमा से बाहर हो चुका था।
अदालत ने टिप्पणी की कि 19 साल पुराने इस अति-मामूली केस का अब ट्रायल चलाना आरोपित का मानसिक उत्पीड़न और कोर्ट के समय की बर्बादी होगी। कोर्ट ने चालान खारिज कर फाइल रिकॉर्ड रूम भेजने का आदेश दिया। इसी तरह के चार अन्य मामलों में भी चालान खारिज किए गए।