Shimla News: हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने कर्मचारियों के हित में अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि विभाग की गलती या कानूनी खींचतान के चलते बहाली में देरी होने पर कर्मचारी उस अवधि का पूरा वेतन पाने का हकदार है। विभाग अपनी नाकामी का लाभ उठाकर कर्मचारियों का हक नहीं मार सकता।
मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने जल शक्ति विभाग डलहौजी की चार अपीलें खारिज कर दीं। यह मामला वर्ष 2000 में हटाए गए दैनिक वेतन भोगी बेलदार अमर सिंह से जुड़ा है। लेबर कोर्ट द्वारा मई 2013 में बहाली के बावजूद विभाग उन्हें 2019 तक टालता रहा।
अदालत के महत्वपूर्ण फैसलों से मिली राहत
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कर्मचारी काम के लिए तैयार थे और लेबर कोर्ट के फैसले पर कोई रोक नहीं थी। विभाग ने उन्हें जबरन बेरोजगार रखा, इसलिए ‘नो वर्क नो पे’ का नियम लागू नहीं होगा। वहीं अन्य मामलों में कोर्ट ने दिव्यांग टीजीटी भर्ती, भूमि अधिग्रहण मुआवजा और राशन ढुलाई नीति पर भी कड़े निर्देश दिए।
न्यायाधीश ज्योत्सना रिवाल दुआ की अदालत ने दिव्यांग टीजीटी के 94 पदों का परिणाम जल्द घोषित करने के निर्देश दिए हैं। सरकार ने बताया कि मेरिट सूची अंतिम चरण में है, जिसकी अगली सुनवाई 16 नवंबर को होगी। उधर, सिरमौर में सड़क निर्माण के लिए बिना मुआवजा निजी भूमि उपयोग करने पर सरकार को कड़ी फटकार लगी।
न्यायाधीश संदीप शर्मा की पीठ ने याचिकाकर्ता बलि राम को दो माह में सीमांकन कर मुआवजा देने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि सह-मालिक अकेले पूरी जमीन की एनओसी नहीं दे सकता। इसके अतिरिक्त, खंडपीठ ने डोर-स्टेप डिलीवरी टेंडर में मालवाहक वाहन का मालिक होना अनिवार्य करने वाली सरकारी नीति को सही ठहराया।
