दिवाली पर चौखट और आंगन में रंगोली सजाने की परंपरा, जानें इसका इतिहास और क्षेत्रीय स्वरूप

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New Delhi News: दीपावली के अवसर पर घरों के मुख्य द्वार और आंगनों को रंगोली से सजाने की परंपरा सदियों पुरानी है। देश के विभिन्न हिस्सों में कोलम, अल्पना और मंडना जैसे नामों से पहचानी जाने वाली यह कला न केवल धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखती है, बल्कि इसका संबंध प्राचीन जीवनशैली और पारंपरिक सामग्रियों के प्रयोग से भी जुड़ा हुआ है।

दीपावली पर्व की तैयारियों में घरों की साफ-सफाई और सजावट के साथ-साथ रंगोली का विशेष स्थान रहता है। दीयों की रोशनी के बीच घर के आंगन और मुख्य दरवाजे की चौखट पर बनाई जाने वाली यह कला भारतीय संस्कृति की विविधता और रचनात्मकता को दर्शाती है।

इतिहासकारों के अनुसार, भारत में शुभ अवसरों पर जमीन पर विभिन्न आकृतियां बनाने की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। यह कला केवल दिवाली तक ही सीमित नहीं रही है, बल्कि पूर्व काल से ही घरों, मंदिरों, पूजा स्थलों और ग्रामीण आंगनों में इसे नियमित रूप से बनाया जाता रहा है।

विभिन्न राज्यों में अलग-अलग रूप और नाम

रंगोली की कला पूरे देश में विविध रूपों और नामों से प्रचलित है। दक्षिण भारत के राज्यों में इसे मुख्य रूप से ‘कोलम’ कहा जाता है, जहां दैनिक दिनचर्या में भी इसे द्वार पर बनाना शुभ माना जाता है।

महाराष्ट्र और उत्तर भारत के अधिकांश क्षेत्रों में इसे ‘रंगोली’ नाम से जाना जाता है। वहीं पश्चिम बंगाल में इसे ‘अल्पना’ और राजस्थान के पारंपरिक घरों में ‘मंडना’ के रूप में उकेरा जाता है। नाम और रूपांकन में भिन्नता होने के बावजूद इन सभी कला रूपों का मूल उद्देश्य घर में सकारात्मकता, स्वागत का भाव और सौंदर्य का संचार करना है।

पारंपरिक सामग्रियों से लेकर आधुनिक स्वरूप तक बदलाव

शुरुआती दौर में रंगोली बनाने के लिए पूरी तरह से प्राकृतिक और खाद्य पदार्थों का इस्तेमाल किया जाता था। इसमें मुख्य रूप से पिसे हुए चावल का आटा, गेहूं का आटा, चूना, गेरू, हल्दी और ताजे फूलों की पंखुड़ियों का उपयोग होता था। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, इन सामग्रियों का प्रयोग छोटे कीट-पतंगों और पक्षियों के लिए भोजन उपलब्ध कराने के सह-अस्तित्व के विचार से भी जुड़ा था।

समय बीतने के साथ इस कला के माध्यमों में भी व्यापक बदलाव आया है। वर्तमान में प्राकृतिक सामग्रियों के साथ-साथ रासायनिक और कृत्रिम रंगों, रेडीमेड स्टेंसिल और आधुनिक डिजाइनों का चलन तेजी से बढ़ा है, जिससे यह पारंपरिक लोककला आज के शहरी जीवन में भी जीवंत बनी हुई है।

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