National News: रेयर अर्थ मिनरल्स के बाद चीन ने अब भारी निर्माण मशीनरी, विशेष रूप से सुरंग खोदने वाली टनल बोरिंग मशीनों (TBM) के निर्यात पर सख्त नियंत्रण लागू करने का निर्णय लिया है। चीन वैश्विक TBM बाजार का 70 प्रतिशत हिस्सा नियंत्रित करता है। भारत अपनी मेट्रो, रेलवे और रणनीतिक सीमावर्ती सुरंग परियोजनाओं के लिए काफी हद तक इन उपकरणों पर निर्भर है, जिससे इन प्रोजेक्ट्स की गति प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।
रेयर अर्थ खनिजों पर आपूर्ति नियंत्रण के बाद चीन अब भारी निर्माण उपकरणों के निर्यात पर भी कड़े नियम लागू करने जा रहा है। इन नए प्रतिबंधों के दायरे में विशालकाय टनल बोरिंग मशीनें (TBM) और अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में कंक्रीट का छिड़काव करने वाली विशेष ‘वेट शॉट्रीट मशीनें’ शामिल हैं। वैश्विक स्तर पर टनल बोरिंग मशीनों का सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक चीन ही है। ऐसे में इन प्रतिबंधों का सीधा असर भारत की कई प्रमुख सड़क, रेलवे और मेट्रो रेल परियोजनाओं पर पड़ सकता है।
बीजिंग ने अपने इस फैसले के पीछे ‘दोहरे उपयोग’ (नागरिक और सैन्य दोनों कार्यों में इस्तेमाल) की संभावना और राष्ट्रीय सुरक्षा को आधार बताया है। चीनी अधिकारियों के अनुसार, उन संवेदनशील देशों और क्षेत्रों को अब सख्त निर्यात लाइसेंसिंग प्रक्रिया से गुजरना होगा, जिनके साथ चीन का सीमा विवाद या कूटनीतिक तनाव चल रहा है।
रणनीतिक हिमालयी परियोजनाओं पर असर की आशंका
भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर लंबे समय से रणनीतिक तनाव बना हुआ है। भारत सीमावर्ती इलाकों में सेना की तेज आवाजाही और बेहतर कनेक्टिविटी के लिए सड़कों, रेलवे लाइनों और सामरिक सुरंगों का तेजी से निर्माण कर रहा है। इन कठिन पहाड़ी इलाकों में निर्माण के लिए आधुनिक TBM और उच्च तुंगता (High Altitude) वाली मशीनरी की जरूरत होती है।
यदि चीन इन मशीनों, उनके कटरहेड्स या आवश्यक स्पेयर पार्ट्स की आपूर्ति रोकता है, तो सीमावर्ती सुरंगों के साथ-साथ दिल्ली, मुंबई और अहमदाबाद बुलेट ट्रेन जैसी शहरी परियोजनाओं के काम में भी रुकावट आ सकती है। इससे पहले भी 2024 में जर्मन कंपनी ‘हेरेंक्नेक्ट एजी’ (Herrenknecht AG) के चीन स्थित प्लांट में बनी मशीनों के भारत निर्यात को लेकर चीनी कस्टम ने अड़चनें पैदा की थीं।
वैश्विक बाजार में चीन का 70 फीसदी दबदबा
वैश्विक स्तर पर भारी टनलिंग मशीनों के निर्माण में चीन की हिस्सेदारी लगभग 70 प्रतिशत है। ‘चाइना रेलवे इंजीनियरिंग इक्विपमेंट ग्रुप’ जैसी चीनी कंपनियां वैश्विक स्तर पर 36 से अधिक देशों को उपकरण निर्यात करती हैं। हालांकि अमेरिका, जापान और जर्मनी (हेरेंक्नेक्ट) में भी इन मशीनों के निर्माण के विकल्प मौजूद हैं, लेकिन अचानक आपूर्ति श्रृंखला को बदलना किसी भी खरीदार के लिए लागत और समय के लिहाज से बेहद चुनौतीपूर्ण होता है।
बीजिंग की सिंघुआ यूनिवर्सिटी के ‘सेंटर फॉर इंटरनेशनल सिक्योरिटी एंड स्ट्रेटेजी’ के फेलो सन चेंगहाओ का मानना है कि उच्च ऊंचाई वाले उपकरणों पर नियंत्रण का संकेत सीधे तौर पर रणनीतिक सीमा क्षेत्रों से जुड़ा है। उनका कहना है कि चीन यह सुनिश्चित करना चाहता है कि उसकी इंजीनियरिंग क्षमताओं का इस्तेमाल किसी प्रतिद्वंद्वी देश के सैन्य बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए न हो सके।
घरेलू विनिर्माण और ‘आत्मनिर्भर भारत’ को बढ़ावा देने की तैयारी
चीन के इस कदम से भारत के सामने जहां अल्पकालिक चुनौतियां खड़ी हो रही हैं, वहीं यह कदम देश को घरेलू विनिर्माण केंद्र के रूप में विकसित करने का बड़ा अवसर भी दे सकता है। भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में भारी निवेश की योजनाएं हैं। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने स्पष्ट किया है कि भारत आगामी पांच वर्षों में सुरंग निर्माण पर 9.6 अरब डॉलर तक का निवेश करने का लक्ष्य लेकर चल रहा है।
केंद्रीय मंत्री ने घरेलू उद्योगों से बोरिंग मशीनों के निर्माण में उतरने का आह्वान किया है। इसके अलावा, विदेशी निर्माताओं को आकर्षित करने और घरेलू स्तर पर भारी मशीनरी उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार 1.2 अरब डॉलर की प्रोत्साहन योजना (PLI योजना) पर भी गंभीरता से विचार कर रही है, ताकि भविष्य में आपूर्ति बाधाओं से सुरक्षित रहा जा सके।