Delhi News: बाजार में विभिन्न रंगों और डिजाइनों की कारें मौजूद हैं, लेकिन उनके टायरों का रंग हमेशा काला ही रहता है। वाहनों के टायर का रंग काला होने के पीछे एक गहरा वैज्ञानिक कारण छिपा हुआ है। दरअसल कार्बन ब्लैक मिलाने से टायरों की मजबूती और उम्र कई गुना बढ़ जाती है।
शुरुआती दौर में दूधिया सफेद रंग के होते थे वाहनों के टायर
साल 1917 से पहले तक गाड़ियों में इस्तेमाल होने वाले टायरों का रंग सफेद या दूधिया हुआ करता था। प्राकृतिक रबर का मूल रंग सफेद ही होता है। उस दौर में मजबूती देने के लिए रबर में जिंक ऑक्साइड मिलाया जाता था, लेकिन फिर भी ये टायर टिकाऊ नहीं होते थे और जल्दी घिस जाते थे।
कम उम्र की वजह से ये पुराने सफेद टायर महज दो से पांच हजार किलोमीटर तक ही चल पाते थे। कंपनियों को वाहनों के लिए एक मजबूत और टिकाऊ विकल्प की सख्त जरूरत थी। बीसवीं सदी की शुरुआत में वैज्ञानिकों ने इस समस्या का स्थायी समाधान तलाशने के लिए कई प्रयोग शुरू किए।
वैज्ञानिक खोज ने कार्बन ब्लैक मिलाकर बदला टायरों का रंग
साल 1910 में केमिस्ट जॉर्ज ओएंसलेगर ने खोज की कि रबर में कार्बन ब्लैक मिलाने से उसकी मजबूती कई गुना बढ़ जाती है। कार्बन ब्लैक एक बेहद महीन कालिख होती है, जिसे मिलाने से रबर का लचीलापन और घिसाव रोधी क्षमता बढ़ जाती है। इसी कारण टायरों का रंग पूरी तरह काला हो गया।
कार्बन ब्लैक के इस्तेमाल से टायरों की औसत उम्र बढ़कर 50,000 किलोमीटर से भी अधिक हो गई है। यह काला रंग गाड़ियों को बेहतर रोड ग्रिप, तेज रफ्तार और भारी वजन सहने की ताकत देता है। इसके अलावा यह सूरज की हानिकारक पैराबैंगनी किरणों से रबर में दरारें पड़ने से भी बचाता है।