दिवाली पर लक्ष्मी पूजन में क्यों जरूरी हैं कौड़ी, कमल और खील-बताशे? जानें इनका धार्मिक महत्व

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Religion News: दीपावली पर धन और समृद्धि की देवी मां लक्ष्मी के पूजन में कुछ खास सामग्रियों का अर्पण अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार कौड़ी, कमल का फूल और खील-बताशे देवी लक्ष्मी को बेहद प्रिय हैं और इनके गहरे आध्यात्मिक व प्रतीकात्मक अर्थ हैं। पूजा में इन सामग्रियों को शामिल करने से घर में सुख-समृद्धि और मां लक्ष्मी का स्थायी वास बना रहता है।

रोशनी का महापर्व दीपावली पूरे देश में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस पावन अवसर पर प्रदोष काल में माता लक्ष्मी और भगवान श्रीगणेश का विधि-विधान से पूजन करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, लक्ष्मी पूजन की थाली में कुछ विशिष्ट वस्तुओं का होना अनिवार्य माना गया है। ये वस्तुएं केवल पूजन सामग्री मात्र नहीं हैं, बल्कि जीवन में पवित्रता, संपन्नता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने वाली मानी जाती हैं।

समुद्र मंथन से जुड़ी कौड़ी और स्थायी धन का वास

शास्त्रों के अनुसार, कौड़ी की उत्पत्ति समुद्र से हुई है और पौराणिक कथाओं में मां लक्ष्मी का प्राकट्य भी समुद्र मंथन से ही माना गया है। इसी कारण कौड़ी को मां लक्ष्मी का सहोदर (भाई/बहन) माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि दीपावली की रात्रि पूजन के बाद अभिमंत्रित पीली या सफेद कौड़ियों को घर की तिजोरी या धन स्थान पर रखने से मां लक्ष्मी का स्थायी निवास होता है। यह परंपरा घर में अनावश्यक खर्चों को रोकती है और धन संचय में वृद्धि कर आर्थिक तंगी को दूर करने में सहायक मानी जाती है।

कीचड़ में खिलकर भी निष्लिप्त रहने का संदेश देता कमल का फूल

कमल का पुष्प देवी लक्ष्मी का अत्यंत प्रिय आसन और उनका प्रमुख प्रतीक है। कमल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह कीचड़ में खिलने के बाद भी गंदगी और जल से पूरी तरह अछूता और निष्कलंक रहता है। पूजा में कमल पुष्प अर्पित करने का प्रतीकात्मक अर्थ यह है कि मनुष्य को भौतिक और मायावी संसार में रहते हुए भी विकारों व लालच से दूर रहकर निष्कलंक व पवित्र जीवन जीना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार, मां लक्ष्मी ऐसे ही सात्विक और निर्मल हृदय वाले जातकों पर अपनी कृपा बरसाती हैं।

नई फसल की समृद्धि और जीवन में मिठास का प्रतीक खील-बताशे

लक्ष्मी पूजन में खील और बताशे का भोग लगाने की परंपरा कृषि संस्कृति और सामाजिक सौहार्द से जुड़ी है। खील का निर्माण नए धान (चावल) से होता है, जो शरद ऋतु में आने वाली नई फसल की पहली उपज का प्रतीक है। अन्नदाता द्वारा ईश्वर को पहली उपज अर्पित करने की कृतज्ञता के रूप में खील चढ़ाई जाती है। वहीं, बताशे की मिठास मानव जीवन और पारिवारिक रिश्तों में मधुरता तथा सकारात्मकता का संचार करती है। पूजन के बाद इस प्रसाद को मिल-बांटकर ग्रहण करने से परिवार में परस्पर प्रेम और एकता मजबूत होती है।

Desh Raj
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