Kolhapur News: पंच दिवसीय दीपावली महापर्व की तैयारियों के बीच महाराष्ट्र के कोल्हापुर स्थित ऐतिहासिक श्री महालक्ष्मी (अंबाबाई) मंदिर में दिवाली को लेकर विशेष उत्साह है। साढ़े तीन शक्तिपीठों में शुमार इस जागृत धाम में दिवाली के अवसर पर सदियों पुरानी अनूठी परंपराएं निभाई जाती हैं। नरक चतुर्दशी से लेकर त्रिपुरारी पूर्णिमा तक मंदिर के विशाल शिखर पर अखंड मशाल और विशेष दीप प्रज्वलित किए जाते हैं, जो भक्तों के लिए गहरी आस्था और आकर्षण का केंद्र हैं।
महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले में स्थित मां अंबाबाई का मंदिर आस्था, इतिहास और वास्तुकला का अद्भुत संगम है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, तिरुपति बालाजी की यात्रा के बाद कोल्हापुर में मां अंबाबाई के दर्शन करने पर ही संपूर्ण फल की प्राप्ति मानी जाती है। मंदिर का प्रमुख आकर्षण वर्ष में दो बार होने वाला ‘किरणोत्सव’ है, जिसमें डूबते हुए सूर्य की किरणें सीधे गर्भगृह में पहुंचकर देवी के चरणों को स्पर्श करती हैं।
मंदिर के शिखर पर अखंड दीप और मशाल जलाने की परंपरा
दीपावली के अवसर पर अंबाबाई मंदिर के शिखर पर विशेष दीपदान और मशाल जलाने की प्राचीन परंपरा है। नरक चतुर्दशी से शुरू होकर यह दीपदान कार्तिक पूर्णिमा (त्रिपुरारी पूर्णिमा) तक निरंतर चलता रहता है। यह परंपरा कार्तिक स्नान और धार्मिक अनुष्ठानों का प्रमुख हिस्सा है। श्रद्धालु ब्रह्ममुहूर्त में पवित्र पंचगंगा नदी में स्नान कर दीपदान करते हैं और फिर मंदिर पहुंचकर देवी के दर्शन करते हैं।
शिखर पर प्रज्वलित होने वाली यह मशाल इस बात का प्रतीक मानी जाती है कि मां महालक्ष्मी की कृपा से भक्तों के जीवन से अज्ञान, कष्ट और आर्थिक तंगी का अंधकार दूर होता है। पद्मपुराण के अनुसार, कार्तिक मास में शक्ति तीर्थों पर दीपदान करने से महान यज्ञों के समान पुण्यफल की प्राप्ति होती है।
स्वर्ण आभूषणों से अलौकिक श्रृंगार
दीपावली के पावन दिनों में मां अंबाबाई का बहुमूल्य और प्राचीन स्वर्ण आभूषणों से विशेष श्रृंगार किया जाता है। भक्तों की अटूट मान्यता है कि दिवाली के अवसर पर मां अंबाबाई के दर्शन करने से कर्ज और आर्थिक संकटों से मुक्ति मिलती है तथा घर में सुख, शांति और धन-धान्य की वृद्धि होती है। इस वर्ष धनतेरस का पर्व 6 नवंबर को और दीपावली का महापर्व 8 नवंबर को मनाया जाएगा, जिसको लेकर मंदिर प्रशासन ने दर्शनार्थियों के लिए विशेष व्यवस्थाएं की हैं।