Delhi News: देश में जनसंख्या और जन्म दर को लेकर नया ट्रेंड सामने आया है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-6) के अनुसार बिहार और उत्तर प्रदेश में फर्टिलिटी रेट तेजी से गिरा है। वहीं आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना जैसे दक्षिणी राज्यों में टोटल फर्टिलिटी रेट में मामूली बढ़त दर्ज की गई है।
उत्तर प्रदेश और बिहार में जन्म दर की स्थिति
संसद में 24 जुलाई 2026 को पेश आंकड़ों के अनुसार देश का औसतन टीएफआर 2.0 बना हुआ है। बिहार का टीएफआर एनएफएचएस-5 के 3.0 से घटकर 2.7 रह गया है। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश का टीएफआर 2.4 से कम होकर 2.2 पर आ गया है, जो छोटे परिवारों के बढ़ते रुझान को दर्शाता है।
दक्षिण भारत के राज्यों में बदला ट्रेंड
दक्षिण भारत में फर्टिलिटी रेट पहले से रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे रहा है। एनएफएचएस-6 के मुताबिक आंध्र प्रदेश में यह 1.7 से बढ़कर 1.8, कर्नाटक में 1.8 और तेलंगाना में 1.9 हो गया है। तमिलनाडु में 1.7 और केरल में यह 1.8 दर्ज किया गया है। लक्षद्वीप का टीएफआर 1.4 से बढ़कर 2.2 पहुंचा है।
आंकड़ों के मुताबिक सबसे कम टीएफआर अंडमान-निकोबार (0.9) और सिक्किम (1.0) में दर्ज किया गया है। सर्वाधिक टीएफआर के मामले में बिहार (2.7) शीर्ष पर है, जबकि उत्तर प्रदेश और झारखंड (2.2) दूसरे स्थान पर हैं। मेघालय में यह 2.1, मध्य प्रदेश और राजस्थान में 2.1 तथा हरियाणा व नागालैंड में 2.0 रहा है।
केंद्र सरकार की नीति और परिवार नियोजन
स्वास्थ्य मंत्रालय का ध्यान सुरक्षित मातृत्व, बच्चों में सही अंतर रखने और परिवार नियोजन सुविधाओं को मजबूत बनाने पर केंद्रित है। इसके लिए उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, असम सहित 13 राज्यों में ‘मिशन परिवार विकास’ कार्यक्रम चलाया जा रहा है। आशा कार्यकर्ताओं के जरिए घर-घर तक गर्भनिरोधक पहुंचाए जा रहे हैं।
बदलती जन्म दर के प्रभाव और चुनौतियां
जन्म दर घटने से भविष्य में वर्किंग पॉपुलेशन घट सकती है और बुजुर्गों की निर्भरता बढ़ सकती है। इससे पेंशन, हेल्थकेयर और सोशल सिक्योरिटी पर दबाव बढ़ेगा। हालांकि, इससे प्रति व्यक्ति संसाधन, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का स्तर बेहतर होता है तथा महिलाओं की वर्कफोर्स में भागीदारी भी काफी हद तक बढ़ जाती है।
दूसरी ओर, उच्च जन्म दर से युवा कार्यबल का मजबूत आधार बना रहता है, जिसे डेमोग्राफिक डिविडेंड कहते हैं। परंतु इसके कारण शिक्षा, स्वास्थ्य और संसाधनों पर भारी दबाव पड़ता है। इससे गरीबी, बेरोजगारी और अनियंत्रित शहरीकरण की चुनौतियां भी काफी बढ़ जाती हैं, जिन्हें नियंत्रित करना सरकार के लिए बड़ी चुनौती बनता है।