भारत में असहमति के घटते दायरे पर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुयन ने जताई चिंता, दिए बड़े बयान

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Bhopal News: सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्जल भुयन ने शनिवार को कहा कि भारत में असहमति और अलग विचारों के लिए जगह लगातार सीमित होती जा रही है। उन्होंने कहा कि अधिकारों के लिए प्रदर्शन करने वाले छात्रों को गिरफ्तार कर लिया जाता है और उन्हें आसानी से जमानत भी नहीं मिलती।

भोपाल के नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी में आयोजित पांचवें जस्टिस जी.पी. सिंह स्मृति व्याख्यान में बोलते हुए जस्टिस भुयन ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन नागरिकों का मूल अधिकार है। उन्होंने कहा कि वैध गतिविधियों को अपराध का रूप देना और विश्वविद्यालयों में सोचने पर दंडात्मक कार्रवाई करना लोकतंत्र के खिलाफ है।

ज़मानत और सख्त शर्तों पर उठाए गंभीर सवाल

जस्टिस भुयन ने मामलों में ज़मानत न मिलने और ज़मानत के बाद लगाई जाने वाली कड़ी शर्तों पर चिंता जाहिर की। उन्होंने गंगा में नाव पर इफ्तारी करने वाले युवाओं को महीनों तक जेल में रखने पर सवाल उठाते हुए कहा कि जिस काम को कानून अपराध नहीं मानता, उसमें जमानत क्यों रोकी जा रही है।

उन्होंने दिल्ली दंगों से जुड़े मामले में छात्र कार्यकर्ताओं पर लगाई गई सख्त शर्तों का भी उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि जमानत देते समय पासपोर्ट जमा कराना या सार्वजनिक सभाओं और सोशल मीडिया पर रोक लगाना नागरिकों की निजी स्वतंत्रता को गंभीर रूप से कमजोर करता है।

बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले की आलोचना

अपने भाषण में जस्टिस भुयन ने बॉम्बे हाई कोर्ट की उस टिप्पणी की आलोचना की, जिसमें गाज़ा के समर्थन में प्रदर्शन की इजाजत नहीं दी गई थी। उन्होंने कहा कि भारत ने फलस्तीन को मान्यता दी है और संयुक्त राष्ट्र में भी भारतीय न्यायाधीशों ने वहां की हिंसा की जांच में अपनी रिपोर्ट दी है।

इसके अलावा उन्होंने सेवानिवृत्ति के बाद पूर्व न्यायाधीशों के राजनीति में शामिल होने को शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के खिलाफ बताया। उन्होंने केशवानंद भारती फैसले का समर्थन किया और इसकी वैधता पर सवाल उठाने वाले बयानों को पूरी तरह से गलत करार दिया।

Mohit
Mohit
पत्रकारिता के क्षेत्र में 9 सालों का अनुभव।

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