New Delhi News: भाखड़ा-नांगल और ब्यास बिजली प्रोजेक्ट से जुड़े करीब 60 साल पुराने विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। सर्वोच्च अदालत ने कहा कि हिमाचल प्रदेश के पक्ष में 15 साल पहले फैसला आ चुका है, लेकिन इसे लागू नहीं किया गया।
पंजाब को कोर्ट का आदेश न मानने पर परिणाम भुगतने की चेतावनी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि पंजाब की आदेश न मानने की आदत पुरानी है। अदालत ने कहा कि हिमाचल को 2011 के फैसले का पूरा लाभ मिलना चाहिए। अगर कोर्ट को यह फैसला लागू कराना पड़ा, तो ब्याज के साथ भुगतान पर विचार होगा। अगली सुनवाई 12 अगस्त को होगी।
यह विवाद साल 1966 में पंजाब के पुनर्गठन के बाद शुरू हुआ था। उस समय हिमाचल प्रदेश ने आरोप लगाया था कि भाखड़ा-नांगल और ब्यास प्रोजेक्ट्स की बिजली में उसे उचित हिस्सा नहीं मिला। इसके बाद हिमाचल ने करीब 30 साल पहले सुप्रीम कोर्ट का रुख कर अपनी याचिका दाखिल की थी।
2011 के फैसले में हिमाचल को मिला था 7.19 प्रतिशत हिस्सा
सुप्रीम कोर्ट ने 27 सितंबर 2011 को दिए फैसले में स्पष्ट किया था कि हिमाचल प्रदेश को इन परियोजनाओं से 7.19 प्रतिशत बिजली पाने का पूरा हक है। शीर्ष अदालत ने इस अधिकार को 1 नवंबर 1966 से प्रभावी माना था, जिससे हिमाचल का दावा कानूनी रूप से बेहद मजबूत हो गया।
अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अदालत को बताया कि नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट के आधार पर ‘कैशलेस सेटलमेंट’ का फॉर्मूला बनाया गया है। इसके तहत पंजाब और हरियाणा सीधे पैसे देने के बजाय हिमाचल को 15 साल तक बिजली देंगे। इससे नकद लेनदेन की जरूरत बिल्कुल खत्म हो जाएगी।
केंद्र के प्रस्ताव पर पंजाब ने जताई आपत्ति, कोर्ट सख्त
हिमाचल प्रदेश और हरियाणा ने केंद्र सरकार के इस प्रस्ताव को अपनी सैद्धांतिक सहमति दे दी है। हालांकि पंजाब का कहना है कि इस मॉडल से उसे बड़ा वित्तीय नुकसान होगा। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब सरकार को अपना पक्ष दोबारा रखने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है।
अदालत ने सख्त लहजे में दोहराया कि हिमाचल के पक्ष में डिक्री पहले से मौजूद है और उसे इसका लाभ मिलना ही चाहिए। कोर्ट ने पंजाब को चेतावनी दी कि यदि उसने आपसी समझौते का रास्ता नहीं चुना, तो अदालत अपने आदेश के मुताबिक सख्त कार्रवाई करने के लिए मजबूर होगी।