Bilaspur News: हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने कथित फर्जी बीपीएल प्रमाण पत्र के जरिए सरकारी नौकरी पाने के मामले में दर्ज एफआईआर को निरस्त कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब सक्षम ग्राम पंचायत को पूरी जानकारी थी, तब प्रमाण पत्र जारी करने को धोखाधड़ी या जालसाजी नहीं कहा जा सकता।
न्यायाधीश संदीप शर्मा ने याचिकाकर्ता प्यार सिंह और अन्य की याचिका स्वीकारते हुए यह अहम निर्णय सुनाया। हाई कोर्ट ने बिलासपुर जिले के झंडूता थाने में दर्ज केस और उससे जुड़ी अदालती कार्यवाही को पूरी तरह खारिज किया। पीठ ने माना कि यह मामला आपसी पारिवारिक रंजिश की वजह से दर्ज कराया गया था।
पारिवारिक विवाद के चलते पुलिस में कराई गई थी झूठी शिकायत
यह मामला जून 2023 का है, जब प्यार सिंह की बेटी का चयन स्वास्थ्य विभाग में बतौर स्टाफ नर्स हुआ था। यह नियुक्ति बीपीएल कोटे के तहत की गई थी। इसके बाद चयनित नर्स की बहन के ससुर ने पुलिस में शिकायत देकर आरोप लगाया कि परिवार ने नियमों का खुला उल्लंघन किया है।
शिकायतकर्ता ने दावा किया था कि नर्स का भाई साल 2022 से मल्टीनेशनल फार्मा कंपनी में असिस्टेंट मैनेजर पद पर कार्यरत है। उसका सालाना पैकेज 13.12 लाख रुपये से अधिक है। इसके बावजूद परिवार ने 2500 रुपये से कम मासिक आय का गलत हलफनामा देकर बीपीएल का अनुचित लाभ उठाया।
ग्राम पंचायत को थी बेटे की नौकरी और पारिवारिक स्थिति की खबर
याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि पंचायत के प्रधान को बेटे की नौकरी की साल 2018 से जानकारी थी। प्यार सिंह के भाई और भाभी की बीमारी से मौत हो चुकी थी। परिवार उनके दो अनाथ छोटे बच्चों का लालन-पालन कर रहा था, जिसके चलते पंचायत ने उन्हें सूची में बनाए रखा।
हाई कोर्ट ने कहा कि ग्राम पंचायत ने स्वयं यह प्रमाण पत्र जारी किया था और उसने कभी कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई। इसलिए इसे जालसाजी नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने सराहना की कि नर्स ने सरकारी सेवा ज्वाइन करते ही पंचायत को अर्जी देकर अपना नाम बीपीएल सूची से कटवा दिया था।