Shivpuri News: मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के करैरा में श्रीराम कथा के दौरान भगवान राम और श्रीकृष्ण की तुलना पर उपजे विवाद के बाद बागेश्वर धाम के कथावाचक पं. धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने सफाई देते हुए माफी मांग ली है। ब्रज क्षेत्र के संतों और यादव समाज की आपत्ति के बाद उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य दोनों भगवानों में भेद करना नहीं बल्कि एक लोक पद की व्याख्या करना था।
शिवपुरी के करैरा में आयोजित श्रीराम कथा के दौरान दिए गए एक बयान को लेकर बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री विवादों में घिर गए थे। 29 अक्टूबर को कथा मंच से उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण और भगवान श्रीराम के स्वरूप की तुलना करते हुए कुछ टिप्पणियां की थीं। इसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद ब्रज के साधु-संतों और यादव समाज ने कड़ी नाराजगी जताई थी। विरोध तेज होते देख सोमवार को कथावाचक ने नया वीडियो जारी कर अपनी स्थिति स्पष्ट की।
कथा के दौरान दिया गया था विवादित बयान
कथा के दौरान धीरेंद्र शास्त्री ने कहा था, “ठाकुर जी की फोटो देख लो, खड़े भी होते हैं तो तीन जगह से टेढ़े। पांव के ऊपर पांव, कमर लचकाए, टेढ़ी गर्दन करके बंसी बजाते हैं। हमारे वाले तो खड़े भी होते हैं तो एकदम सीधे। उनका नाम भी सीधा, चलना भी सीधा और दिखते भी सीधे हैं। तुम्हारे वालों का नाम भी टेढ़ा, चलते भी टेढ़े, खड़े भी टेढ़े।”
उन्होंने आगे कहा था कि बंसी बजाना और गाय चराना आसान खेल हो सकता है, लेकिन धनुष उठाना और बंदरों को अनुशासित करना खेल नहीं है। उन्होंने यह भी कहा था कि पर्वत उठाने में क्या बड़ी बात है, हमारे भगवान के भक्त हनुमान ने तो पूरा पर्वत ही उठा लिया था।
ब्रज के संतों के विरोध पर धीरेंद्र शास्त्री की सफाई
वीडियो सामने आने के बाद ब्रज क्षेत्र के धर्माचार्यों ने इसे सनातन परंपरा और आराध्यों का अपमान बताते हुए आपत्ति दर्ज कराई थी। इस पर सफाई देते हुए धीरेंद्र शास्त्री ने कहा कि उनके बयान को संदर्भ से काटकर पेश किया गया है। उन्होंने कहा, “हम स्वयं ठाकुर जी और ब्रज धाम के अनन्य भक्त हैं। हमारा नाम भी कृष्ण से जुड़ा है और हमने सदैव कृष्ण जन्मभूमि के लिए आवाज उठाई है।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि वे केवल एक प्रचलित लोक पद की व्याख्या कर रहे थे, जिसमें गोपियां भाव-संवाद के तहत श्रीकृष्ण को उलाहना देती हैं। धीरेंद्र शास्त्री ने कहा कि राम और कृष्ण में भेद करने का उनका कोई आशय नहीं था। यदि उनकी व्याख्या से किसी भी श्रद्धालु या संत की भावनाओं को ठेस पहुंची है, तो वे इसके लिए खेद व्यक्त करते हुए क्षमा मांगते हैं।