Delhi News: दिल्ली-एनसीआर में एक अक्टूबर से बिना वैध ‘प्रदूषण नियंत्रण में’ (पीयूसी) सर्टिफिकेट वाले वाहनों को पेट्रोल और डीजल नहीं मिलेगा। वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) के निर्देश 101 के तहत यह सख्त पाबंदी लागू की गई है। दिल्ली के सभी 500 फ्यूल स्टेशनों पर ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकग्निशन कैमरों से निगरानी की जाएगी।
नियमों का उल्लंघन करने वाले पेट्रोल पंपों पर भी सख्त प्रशासनिक कार्रवाई की जाएगी। दूसरी ओर, विशेषज्ञों ने मौजूदा प्रदूषण जांच प्रणाली की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। इंटरनेशनल काउंसिल ऑन क्लीन ट्रांसपोर्टेशन (आईसीसीटी) के अनुसार, पीयूसी पास करने का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि वह गाड़ी सड़क पर हवा को दूषित नहीं कर रही है।
वर्तमान पीयूसी टेस्ट की तकनीकी सीमाएं और अध्ययन के नतीजे
मौजूदा समय में पेट्रोल और सीएनजी गाड़ियों में सिर्फ कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोकार्बन की जांच होती है। डीजल गाड़ियों में केवल धुएं का घनत्व नापा जाता है। हवा को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाले पार्टिकुलेट मैटर, पार्टिकल नंबर और नाइट्रोजन ऑक्साइड (एनओएक्स) जैसे घातक तत्वों की इस टेस्ट में कोई सीधी जांच नहीं की जाती है।
आईसीसीटी ने दिल्ली और गुरुग्राम में एक लाख से अधिक गाड़ियों पर अध्ययन किया। रिपोर्ट के मुताबिक बीएस-6 टैक्सी और हल्के कमर्शियल वाहन, सामान्य निजी कारों के मुकाबले 2.4 से 5 गुना तक ज्यादा एनओएक्स छोड़ते हैं। इतना ही नहीं, सड़क पर सीएनजी गाड़ियों से निकलने वाला वास्तविक धुआं भी उम्मीद से कहीं ज्यादा दर्ज किया गया है।
जांच केंद्रों की कार्यप्रणाली में कमियां और जरूरी सुधार
बीएस-6 डीजल कारों में कालिख रोकने के लिए लगे फिल्टर की खराबी को पुराना टेस्ट पकड़ नहीं पाता है। दिल्ली के 22 केंद्रों की पड़ताल में जांच प्रक्रिया में भारी कमियां, रीडिंग में अंतर और फेल वाहनों की कम रिपोर्टिंग उजागर हुई। यूरोपीय आयोग ने भी ऐसे वाहनों के लिए पार्टिकल नंबर टेस्ट कराने की स्पष्ट सिफारिश की है।
विशेषज्ञों का मानना है कि प्रदूषण रोकने के लिए केवल पेट्रोल पंप पर चेकिंग काफी नहीं है। इसके लिए सड़कों पर रिमोट सेंसिंग डिवाइस लगाने चाहिए, जो चलती गाड़ियों के उत्सर्जन को तुरंत पकड़ सकें। इसके साथ ही ऑन-बोर्ड डायग्नोस्टिक्स, आंतरिक दहन इंजन वाले वाहनों को हटाने और इलेक्ट्रिक वाहनों को तेजी से बढ़ावा देने की जरूरत है।