Shimla News: हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव के लिए अब केवल 14 महीने का समय बचा है। इस बीच राज्य की सत्तारूढ़ कांग्रेस सरकार के सामने एक बड़ा राजनीतिक सवाल खड़ा हो गया है। पार्टी का पूरा ध्यान बचे हुए कार्यकाल में बड़े फैसले लेने पर रहेगा या दिल्ली की अंदरूनी सियासत ही उसके एजेंडे पर हावी रहेगी?
प्रदेश में चुनावी तैयारियों को रफ्तार देने और विकास कार्यों को आगे बढ़ाने का यह सबसे अहम समय है। हालांकि, सत्तारूढ़ कांग्रेस के भीतर चल रही आपसी खींचतान ने पार्टी का फोकस काफी हद तक बदल दिया है। उपमुख्यमंत्री समेत कई वरिष्ठ मंत्री पिछले कुछ दिनों से दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं, जिससे सामान्य स्थिति के दावों पर सवाल उठ रहे हैं।
मुख्यमंत्री सुखविन्द्र सिंह सुक्खू और संगठन का शीर्ष नेतृत्व भले ही गुटबाजी की बातों से लगातार इनकार करता रहा हो, लेकिन दिल्ली की हलचल अलग ही कहानी बयां कर रही है। सूत्रों के मुताबिक हाईकमान के स्तर पर नेताओं को मनाने और शक्ति संतुलन साधने की कोशिशें जारी हैं। मंत्रियों ने वरिष्ठ नेता राहुल गांधी से मिलने का वक्त भी मांगा है।
सुक्खू सरकार का कार्यकाल साढ़े तीन साल से अधिक पूरा हो चुका है। ऐसे में सरकार के सामने केवल घोषणाएं और गारंटियां पूरी करने की चुनौती नहीं है, बल्कि अगले 14 महीनों का स्पष्ट रोडमैप रखना भी बेहद जरूरी है। सीमित वित्तीय संसाधनों के बीच वेतन, पेंशन और विकास कार्यों के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं दिख रहा है।
कार्यकाल के इस अंतिम चरण में जनता अब यह देखना चाहती है कि गारंटियों से अलग सरकार ने जमीन पर क्या नया काम किया है। वित्तीय संसाधन जुटाने के बड़े-बड़े दावों से आगे बढ़कर अब बजट का वास्तविक प्रबंध करना होगा। इसके लिए सरकार और पार्टी संगठन के बीच बेहतर तालमेल होना बहुत आवश्यक है।
दिल्ली में जारी खींचतान ने कांग्रेस हाईकमान के सामने भी डैमेज कंट्रोल की बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। चुनाव से ठीक पहले सरकार और संगठन को एक मंच पर रखना जरूरी है। पंजाब में चुनाव से ठीक पहले नेतृत्व परिवर्तन के प्रयोग के जो नतीजे रहे हैं, उन्हें देखते हुए हाईकमान किसी विवाद को लंबा नहीं खींचना चाहेगा।
मुख्य विपक्षी दल भाजपा फिलहाल इस पूरे सियासी घटनाक्रम पर पैनी नजर रखे हुए है। हालांकि बीजेपी ने अभी तक कोई बड़ा आधिकारिक हमला नहीं बोला है, लेकिन कांग्रेस की अंदरूनी कलह उसके लिए बड़ा मुद्दा बन सकती है। कांग्रेस छोड़ भाजपा में आए सुधीर शर्मा पहले ही सोशल मीडिया पर तंज कस चुके हैं।
अंतिम दौर में पहुंची कांग्रेस के पास अब समय बहुत कम बचा है। जनता के बीच जाने से पहले पार्टी को दिल्ली की अंदरूनी खींचतान खत्म कर सरकार, संगठन और सभी नेताओं को एक साथ लाना होगा। आपसी गुटबाजी का हर एक दिन पार्टी के मिशन-2027 की तैयारियों पर भारी पड़ सकता है।