Delhi News: नेशनल स्टैटिस्टिकल ऑफिस (एनएसओ) के नए आंकड़ों के मुताबिक पहाड़ी और जनजातीय इलाकों की महिलाएं मैदानी तथा मेट्रो शहरों के मुकाबले काम में अधिक सक्रिय हैं। सीमित आय के बावजूद इनकी काम करने की इच्छा और अवसर दिल्ली-बिहार जैसे बड़े राज्यों से कहीं अधिक हैं।
यह रिपोर्ट पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे (पीएलएफएस) के तहत जिला स्तर पर जारी हुई है। इसमें श्रम बल भागीदारी दर (एलएफपीआर), श्रमिक जनसंख्या अनुपात (डब्ल्यूपीआर), बेरोजगारी दर और शिक्षा, रोजगार या प्रशिक्षण से बाहर (नीट) युवाओं का पूरा डेटा शामिल किया गया है।
एनएसओ ने पहली बार जिलावार आंकड़े जारी कर तस्वीर साफ की है। इसमें काम करने की इच्छा रखने वाले लोगों (एलएफपीआर) और वास्तव में काम करने वालों (डब्ल्यूपीआर) का विश्लेषण है। हिमाचल, ओडिशा और जम्मू-कश्मीर की महिलाएं शहरी महिलाओं की तुलना में कामकाज में ज्यादा आगे हैं।
हिमाचल प्रदेश का हमीरपुर जिला पूरे देश में महिला श्रम भागीदारी में शीर्ष पर है। यहां महिला एलएफपीआर 80.9 प्रतिशत और डब्ल्यूपीआर 80.0 प्रतिशत दर्ज किया गया है। इसका मतलब है कि हमीरपुर की करीब 80 फीसदी महिलाएं या तो काम कर रही हैं या रोजगार की तलाश में हैं।
सर्वे में ओडिशा का मयूरभंज जिला 71.8% एलएफपीआर और 71.2% डब्ल्यूपीआर के साथ दूसरे स्थान पर है। वहीं जम्मू-कश्मीर का बडगाम जिला तीसरे और छत्तीसगढ़ का सरगुजा 69.0% एलएफपीआर के साथ चौथे स्थान पर बना हुआ है।
इसके उलट दिल्ली, बिहार और पंजाब जैसे राज्यों में आंकड़े काफी निराश करते हैं। पूर्वी दिल्ली में महिला एलएफपीआर केवल 18.9 प्रतिशत दर्ज किया गया है। बिहार का सिवान जिला भी काफी पीछे है, जबकि पंजाब के पटियाला में यह आंकड़ा 39.3 प्रतिशत ही पहुंच पाया है।
अन्य राज्यों की बात करें तो राजस्थान के दौसा में 60.9%, मध्य प्रदेश के धार में 59.6% और आंध्र प्रदेश के श्री सत्य साईं जिले में 59.1% महिला भागीदारी दर्ज हुई है। वहीं तेलंगाना के जगतियाल जिले में यह आंकड़ा 63.2% दर्ज किया गया है।
रिसर्च स्कॉलर निखिल गुप्ता के अनुसार पहाड़ी और जनजातीय समाजों में महिलाएं पारंपरिक तौर पर खेती और घरेलू अर्थव्यवस्था से जुड़ी रहती हैं। वहां का सामाजिक ताना-बाना समानता पर आधारित है, जबकि बड़े शहरों में सामाजिक-आर्थिक कारणों से महिलाओं की औपचारिक कामकाज में भागीदारी काफी कम है।