New Delhi News: भारत में हरित ऊर्जा के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल के कारण बिजली क्षेत्र से होने वाले कार्बन उत्सर्जन पर प्रभावी रोक लगी है। वर्ष 2024 की पहली छमाही से 2026 की इसी अवधि तक इसमें कोई वृद्धि दर्ज नहीं हुई। पचास वर्षों में पहली बार ऐसा हुआ है जब दो साल तक कोयला आधारित बिजली नहीं बढ़ी।
ब्रिटेन के प्रमुख शोध संस्थान कार्बन ब्रीफ द्वारा गुरुवार को जारी विश्लेषण में इस बड़ी उपलब्धि को रेखांकित किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार देश में बिजली की कुल खपत बढ़ने के बावजूद कोयले से बनने वाली बिजली में कोई बढ़ोतरी नहीं देखी गई, जो ऊर्जा क्षेत्र में एक ऐतिहासिक बदलाव का स्पष्ट संकेत है।
तेल और गैस खपत में आई सात फीसदी की गिरावट
रिपोर्ट में बताया गया है कि देश में लगातार दो वर्षों से तेल और गैस के उपयोग में कमी दर्ज की गई है। सड़क परिवहन में ईंधन की भारी जरूरत होने के बाद भी तेल-गैस से होने वाले उत्सर्जन में सालाना सात प्रतिशत की गिरावट आई। इस कमी ने होर्मुज संकट के आर्थिक झटके को काफी हद तक कम किया है।
हालांकि वर्ष 2026 की पहली छमाही में देश का कुल उत्सर्जन 3.7 फीसदी बढ़ा है। इसकी मुख्य वजह भारी उद्योगों से निकलने वाला धुआं रहा। सीमेंट और स्टील क्षेत्र से होने वाले उत्सर्जन में आठ प्रतिशत की वृद्धि हुई, जिसकी देश के कुल कार्बन उत्सर्जन में लगभग तेईस प्रतिशत की बड़ी हिस्सेदारी दर्ज की गई है।
सौर ऊर्जा ने पूरी की देश की बढ़ती बिजली मांग
बीते दो सालों के दौरान बिजली की मांग में सात फीसदी की बढ़ोतरी हुई, जिसे पूरी तरह स्वच्छ ऊर्जा से पूरा किया गया। इस दौरान तिरसठ टेरावाट-घंटे अतिरिक्त बिजली जुड़ी, जो स्विट्जरलैंड की कुल खपत के बराबर है। इसके अलावा 77 गीगावाट की नई सोलर क्षमता ने कुल बढ़ी मांग का 60% हिस्सा संभाला।
राज्यों के प्रदर्शन की बात करें तो गुजरात ने जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटाने और स्वच्छ बिजली उत्पादन में शीर्ष स्थान हासिल किया। इसके बाद राजस्थान और तमिलनाडु का प्रदर्शन सबसे बेहतर रहा। रिपोर्ट के मुताबिक रफ्तार बनाए रखने के लिए अब ग्रिड अपग्रेडेशन और एनर्जी स्टोरेज क्षमता को तेजी से बढ़ाना बेहद जरूरी होगा।