सड़क पर शक्ति प्रदर्शन की होड़: क्या संस्थानों पर सवालों के सहारे सत्ता का मुकाबला कर पाएगा विपक्ष?

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National News: देश की राजनीति में इन दिनों सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच सड़कों पर शक्ति प्रदर्शन की अनोखी होड़ देखने को मिल रही है। विपक्ष जहां कथित चुनावी गड़बड़ियों और संस्थाओं की भूमिका को लेकर आक्रामक है, वहीं केंद्र में सत्तारूढ़ दल भी अपने कार्यकर्ताओं के साथ सड़कों पर उतर रहा है। चुनावी हार-जीत और सांकेतिक विरोधों के बीच भारतीय राजनीति का यह नया दौर कई गंभीर सवाल खड़े करता है।

वैश्विक स्तर पर फैली राजनीतिक असंतुष्टि के बीच भारत का परिदृश्य थोड़ा अलग नजर आ रहा है। देश में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के बीच एक-दूसरे को नीचा दिखाने और जनसमर्थन साबित करने की तीखी राजनीतिक स्पर्धा छिड़ गई है। विपक्ष की हालिया लामबंदी और सर्वोच्च न्यायालय तक हुए मार्च के बाद राजधानी दिल्ली में सियासी तापमान लगातार बढ़ रहा है। रामलीला मैदान में विपक्ष के बड़े जुटान के समानांतर सत्ता पक्ष के कार्यकर्ताओं का तिरंगा लेकर सड़कों पर उतरना इस बात का संकेत है कि मुकाबला अब केवल संसद तक सीमित नहीं रह गया है।

सत्तारूढ़ दल द्वारा लोकतंत्र की बहाली और अराजकता की समाप्ति के नारों के साथ सड़क पर उतरने को राजनीतिक विश्लेषक एक रणनीतिक शक्ति प्रदर्शन मान रहे हैं। इसका सीधा उद्देश्य यह संदेश देना दिखाई पड़ता है कि भीड़ जुटाने की क्षमता में विपक्ष अकेले नहीं है। हालांकि, केंद्र में मजबूत सरकार होने के बावजूद इस प्रकार के जवाबी विरोध प्रदर्शनों ने राजनीतिक हलकों में कई तरह की चर्चाओं को जन्म दिया है।

चुनावी नतीजों की हकीकत और तीसरे कार्यकाल की चुनौतियां

सड़क पर प्रदर्शनों के इस दौर के बीच आए विधान परिषदों के चुनावी नतीजों ने चुनावी समीकरणों की एक अलग ही तस्वीर पेश की है। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में विपक्ष की स्थिति तो कमजोर रही ही, कर्नाटक जैसे राज्य में भी, जहां उसकी सरकार है, प्रदर्शन अपेक्षित नहीं रहा। इन नतीजों के बाद सत्ता पक्ष को यह दावा करने का मौका मिला कि मतदान के तरीके चाहे जो भी हों, चुनावी गणित में विपक्ष अब भी काफी पीछे है।

राजनीतिक इतिहास के नजरिए से देखें तो किसी भी नेता या सरकार के लगातार तीसरे कार्यकाल का तीसरा साल अक्सर सबसे चुनौतीपूर्ण माना जाता है। इतिहास में कई बड़े नेतृत्वों को अपने तीसरे दौर में जनआकांक्षाओं और बढ़ते असंतोष के दबाव का सामना करना पड़ा है। वर्तमान संदर्भ में भले ही विपक्ष इसे सत्ता के ‘कठिन दिनों’ की शुरुआत के रूप में प्रस्तुत कर रहा हो, लेकिन ठोस चुनावी जीत के बिना इसे बड़े राजनीतिक बदलाव में बदलना आसान नहीं दिखता।

संस्थाओं पर सवाल और सांकेतिक महाभियोग की रणनीति

इस पूरे राजनीतिक संघर्ष में विपक्ष के कुछ हालिया कदमों ने विश्लेषकों को चौंकाया है। मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ ‘जनता का महाभियोग’ जैसी सांकेतिक प्रक्रिया आयोजित करने के फैसले को राजनीति के जानकार एक अपरिपक्व कदम के रूप में देख रहे हैं।

संसदीय लोकतंत्र की मजबूती उसकी संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा और स्वतंत्रता पर टिकी होती है, जिसमें चुनाव आयोग सबसे प्रमुख स्तंभ है। जानकारों का मानना है कि संवैधानिक संस्थाओं पर सीधे ‘वोट चोरी’ जैसे आरोप मढ़ना और समानांतर महाभियोग जैसी प्रतीकात्मक कार्रवाई करना गंभीर लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करता है। चुनावी हार की समीक्षा करने और जनता के बीच ठोस विकल्प पेश करने के बजाय केवल संस्थाओं पर सवाल खड़े करने की यह रणनीति विपक्ष को कितना लाभ पहुंचा पाएगी, यह आने वाला समय ही तय करेगा।

Desh Raj
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