National News: खाली कमरे में बोलते ही आवाज गूंजने लगती है, जिसके पीछे ध्वनि विज्ञान और भौतिकी के नियम काम करते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, कंक्रीट की सख्त दीवारें सोनिक मिरर की तरह आवाज को लौटाती हैं। कमरे में फर्नीचर न होने से ध्वनि ऊर्जा सोखने का माध्यम नहीं बचता, जिससे रिवर्बरेशन और आवाज में भारीपन पैदा होता है।
किसी खाली या बिना फर्नीचर वाले नए कमरे में प्रवेश करते ही हमारी अपनी आवाज लौटकर गूंजने लगती है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह कोई रहस्य नहीं, बल्कि ध्वनि विज्ञान (Acoustics) और भौतिकी के बुनियादी नियमों का परिणाम है। किसी भी कमरे में ध्वनि तरंगों का व्यवहार वहां मौजूद सतहों और वस्तुओं की बनावट पर निर्भर करता है।
नासा के अनुसार, ध्वनि तरंगों का व्यवहार काफी हद तक प्रकाश तरंगों जैसा ही होता है। जिस तरह दर्पण प्रकाश को परावर्तित करता है, उसी प्रकार कंक्रीट, कांच या टाइल्स जैसी सख्त सतहें आवाज के लिए ‘सोनिक मिरर’ का कार्य करती हैं। सामान्य घरों में मौजूद सोफे, पर्दे, गद्दे और कालीन जैसी वस्तुएं ध्वनि की ऊर्जा को सोख लेती हैं, जिससे आवाज टकराकर नहीं लौटती। खाली कमरे में इन वस्तुओं की अनुपस्थिति के कारण ध्वनि बिना किसी अवरोध के सीधे दीवारों से टकराकर वापस आती है।
95 से 99 प्रतिशत तक आवाज लौटा देती हैं सख्त दीवारें
होल बिल्डिंग डिजाइन गाइड (WBDG) के आंकड़ों के मुताबिक, विभिन्न सामग्रियों की ध्वनि अवशोषण क्षमता अलग-अलग होती है। ईंट और कंक्रीट जैसी सख्त सामग्रियां अपने ऊपर पड़ने वाली 95 से 99 प्रतिशत तक ध्वनि तरंगों को वापस परावर्तित कर देती हैं। इस स्थिति में आवाज कमरे की आमने-सामने की दीवारों के बीच पिंग-पोंग गेंद की तरह तब तक टकराती रहती है, जब तक कि उसकी ऊर्जा पूरी तरह समाप्त न हो जाए।
‘इको’ और ‘रिवर्बरेशन’ के बीच का वैज्ञानिक अंतर
सामान्य बोलचाल में इसे गूंज या ‘इको’ कहा जाता है, लेकिन ध्वनिकी के अनुसार स्पष्ट इको उत्पन्न होने के लिए परावर्तक सतह और बोलने वाले के बीच कम से कम 17.2 मीटर की दूरी आवश्यक होती है। सामान्य आकार के कमरों में ध्वनि तरंगें 0.1 सेकंड से भी कम समय में टकराकर वापस लौट आती हैं। अत्यंत तीव्र गति से तरंगों के आपस में मिलने की इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक भाषा में ‘रिवर्बरेशन’ (Reverberation) कहा जाता है। प्रकाश की तुलना में ध्वनि की गति धीमी होने के कारण मानव कान इस परावर्तन को आसानी से महसूस कर लेते हैं।
कंस्ट्रक्टिव इंटरफेरेंस से तेज सुनाई देती है आवाज
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ऑक्यूपेशनल सेफ्टी एंड हेल्थ (NIOSH) के अनुसार, खाली स्थान में मूल ध्वनि और दीवारों से टकराकर लौट रही ध्वनि तरंगें आपस में मिल जाती हैं। विज्ञान में इस प्रक्रिया को ‘कंस्ट्रक्टिव इंटरफेरेंस’ कहा जाता है। दीवारों के बीच लगातार होने वाले इस टकराव से कमरे में रिंगिंग इफेक्ट और भारी गूंज पैदा होती है, जिससे आवाज सामान्य से अधिक तेज सुनाई देती है। हालांकि, कमरे में फर्नीचर, कालीन या अन्य घरेलू वस्तुएं व्यवस्थित करते ही ध्वनि तरंगों का परावर्तन चक्र टूट जाता है और आवाज का गूंजना बंद हो जाता है।