World News: विशाल समुद्री जहाजों का पानी के भीतर रहने वाला निचला हिस्सा हमेशा गहरे लाल रंग से रंगा जाता है। इसके पीछे केवल सौंदर्य या परंपरा नहीं, बल्कि ‘बायोफाउलिंग’ से बचाव का वैज्ञानिक कारण, ईंधन की बचत और ‘प्लिमसोल लाइन’ की सुरक्षा निगरानी जैसे महत्वपूर्ण पहलू जुड़े हैं।
विशालकाय समुद्री जहाजों के ऊपरी हिस्से भले ही अलग-अलग रंगों के हों, लेकिन उनका पानी में डूबा रहने वाला तल हमेशा गहरे लाल रंग का दिखाई देता है। यह रंग कोई साधारण पसंद नहीं है, बल्कि इसके पीछे समुद्री विज्ञान, भारी आर्थिक बचत और सुरक्षा के बेहद कड़े नियम काम करते हैं।
‘बायोफाउलिंग’ और ईंधन की भारी बर्बादी का खतरा
जब कोई जहाज लंबे समय तक समुद्र के खारे पानी में सफर करता है, तो काई, सीपियां और सूक्ष्म समुद्री जीव उसके निचले हिस्से पर चिपकने लगते हैं। इस प्राकृतिक प्रक्रिया को विज्ञान में ‘बायोफाउलिंग’ कहा जाता है। लाखों जीवों के चिपकने से जहाज का वजन कई टन बढ़ जाता है और उसका चिकना तल खुरदरा हो जाता है।
सतह खुरदरी होने से पानी को चीरते समय घर्षण बहुत बढ़ जाता है, जिससे जहाज की गति धीमी हो जाती है। अपनी सामान्य रफ्तार बनाए रखने के लिए इंजन को अतिरिक्त ताकत लगानी पड़ती है, जिसके चलते लाखों लीटर महंगे ईंधन की बर्बादी होती है। शिपिंग उद्योग के लिए इस नुकसान को रोकना एक बड़ी चुनौती थी।
कॉपर ऑक्साइड और एंटी-फाउलिंग पेंट का विज्ञान
इस समस्या से निपटने के लिए वैज्ञानिकों और नाविकों ने ‘एंटी-फाउलिंग पेंट’ तैयार किया। पारंपरिक रूप से इस लेप में प्रचुर मात्रा में तांबे (कॉपर) का उपयोग किया जाता था, जो समुद्री जीवों और काई के पनपने को रोकता है। चूंकि कॉपर ऑक्साइड का प्राकृतिक रंग लाल होता है, इसलिए जब इसे जहाजों के तल पर लगाया गया तो वह अपने आप लाल रंग का दिखने लगा।
आधुनिक दौर में लाल रंग और प्लिमसोल लाइन की सुरक्षा
हालांकि आधुनिक तकनीक से अब एंटी-फाउलिंग पेंट किसी भी रंग में तैयार किया जा सकता है, लेकिन फिर भी लाल रंग का ही उपयोग जारी है। इसका मुख्य कारण सुरक्षा जांच से जुड़ा हुआ है।
हर मालवाहक जहाज के बाहरी हिस्से पर पानी के स्तर को मापने के लिए सफेद या पीले रंग से ‘प्लिमसोल लाइन’ और ड्राफ्ट मार्किंग की जाती है। यह रेखा दर्शाती है कि जहाज पर कितना भार सुरक्षित रूप से लादा गया है। गहरे लाल रंग के बैकग्राउंड पर सफेद या पीले निशान बेहद स्पष्ट और दूर से नजर आते हैं, जिससे बंदरगाह पर तैनात सुरक्षा कर्मचारियों को जहाज के ओवरलोड होने की स्थिति तुरंत पता चल जाती है।