Shimla News: हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले में सेब का सीजन तेज हो गया है। इसके साथ ही बागवानों के सामने मजदूरों की बढ़ती दिहाड़ी बड़ी समस्या बन गई है। सेब तोड़ने, ग्रेडिंग करने और पैकिंग के लिए मजदूरों की मांग बढ़ते ही दिहाड़ी 800 से 900 रुपये प्रतिदिन पहुंच गई है।
मजदूरी की दरें तय न होने से बढ़ीं मुश्किलें
बढ़ती मजदूरी का सबसे बड़ा असर छोटे और मध्यम बागवानों पर पड़ रहा है। उनकी फसल की कुल लागत लगातार बढ़ती जा रही है। बागवानों का कहना है कि प्रशासन हर साल सेब की ढुलाई का किराया तो तय करता है, लेकिन मजदूरों की दिहाड़ी को लेकर कोई स्पष्ट नीति या व्यवस्था नहीं बनाई जाती है।
स्थानीय बागवानों के अनुसार सीजन के दौरान मजदूरों की कमी का फायदा उठाकर दिहाड़ी मनमाने तरीके से बढ़ा दी जाती है। किसान इस मुद्दे को हर साल प्रशासन और स्थानीय पंचायतों के सामने उठाते हैं। इसके बावजूद अब तक इस समस्या के समाधान के लिए कोई ठोस व्यवस्था नहीं बन पाई है।
उत्पादन लागत पर पड़ रहा सीधा असर
ठियोग के बागवान पवन शर्मा और संजीव शर्मा, कोटखाई के सुरेश चौहान तथा चौपाल के मंजीत मेहता ने बताया कि काम के हिसाब से अलग-अलग मजदूरों की जरूरत होती है। मांग ज्यादा होने से मजदूरी लगातार बढ़ रही है। इससे सेब तैयार करने और बाजार तक पहुंचाने की लागत काफी बढ़ गई है।
भाड़े की तर्ज पर मजदूरी दरें तय करने की मांग
बड़े बागवान इस अतिरिक्त खर्च को सह लेते हैं, लेकिन सीमित उत्पादन वाले छोटे किसान भारी आर्थिक दबाव में आ जाते हैं। बागवानों ने मांग की है कि प्रशासन परिवहन किराये की तरह मजदूरी की दरें भी निश्चित करे। इससे मजदूरों और बागवानों दोनों के बीच संतुलन बना रहेगा और राहत मिलेगी।
सेब सीजन के दौरान दिहाड़ी तय करने का मामला पिछली जिला परिषद बैठकों में भी कई बार उठ चुका है। इस दौरान सदस्यों ने जिला उपायुक्त के सामने भी यह मुद्दा प्रमुखता से रखा था। इसके बावजूद प्रशासन ने अब तक मजदूरी निर्धारण को लेकर कोई कदम नहीं उठाया है, जिससे परेशानी बनी हुई है।