मंडी के थुनाग में बादल फटने से तबाही की वजह केवल बारिश नहीं, बेतरतीब निर्माण और अतिक्रमण भी जिम्मेदार: अध्ययन

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Mandi News: हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में थुनाग में हुई तबाही सिर्फ भारी बारिश का नतीजा नहीं थी। भारतीय शोधकर्ताओं के एक नए अध्ययन से खुलासा हुआ है कि नदी के प्राकृतिक रास्ते में अतिक्रमण, बेतरतीब निर्माण और ढलान वाली भौगोलिक स्थिति ने इस आपदा को अधिक खतरनाक बना दिया।

हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड रेजिलिएंस ने 29 जून से 1 जुलाई 2025 के बीच थुनाग में आई बाढ़ का गहरा अध्ययन किया। यह शोध पत्र जियोमैटिक्स, नेचुरल हैजर्डस एंड रिस्क जर्नल में प्रकाशित हुआ। इसमें महेश शर्मा, सायंतन मंडल और शुभम अवस्थी शामिल थे।

अध्ययन के अनुसार नदी के प्राकृतिक गलियारे में घरों, इमारतों, रिटेनिंग वॉल और सड़क तटबंधों के निर्माण ने पानी के प्रवाह को रोक दिया। बहाव का रास्ता संकरा होने से पानी की रफ्तार और गहराई काफी बढ़ गई। तेज पानी ने नदी के किनारों को काटते हुए इमारतों को भारी नुकसान पहुंचाया।

शोधकर्ताओं ने पाया कि इमारत की मजबूती से ज्यादा उसकी नदी से दूरी मायने रखती थी। नदी तट के बेहद करीब बनी इमारतें पूरी तरह तबाह हो गईं। दूसरी ओर थोड़ी दूरी और ऊंचाई पर स्थित कई कच्चे मकान भी इस विनाशकारी बाढ़ में पूरी तरह सुरक्षित बच गए।

रिपोर्ट बताती है कि बाढ़ से पहले 26 से 29 जून के बीच थुनाग में 85.2 मिलीमीटर बारिश हुई थी। इससे जमीन पहले ही पानी से भर चुकी थी। इसके बाद 30 जून को 119.4 मिमी और 1 जुलाई को 216.8 मिमी यानी कुल 336.2 मिमी बारिश दर्ज की गई।

कंप्यूटर मॉडल के जरिए किए गए अध्ययन से पता चला कि तेज बारिश का पानी पहाड़ी ढलानों से होकर नदी-नालों में जमा हो गया। बारिश के चरम पर पहुंचने के 30 से 60 मिनट के भीतर पानी बहुत तेजी से फैल गया। संकरे रास्तों पर पानी की गहराई कई मीटर तक बढ़ गई।

सैटेलाइट तस्वीरों और बाढ़ के कंप्यूटर मॉडल के जरिए किए गए विश्लेषण में 205 इमारतों के प्रभावित होने की पुष्टि हुई। इनमें 160 पक्के और 55 कच्चे या मिले-जुले मकान थे। सरकारी सर्वे से मिलान करने पर मॉडल का अनुमान 95.34 प्रतिशत सही पाया गया।

अध्ययन के मुताबिक थुनाग में प्रत्यक्ष आर्थिक नुकसान 6.2 से 7.8 करोड़ रुपये के बीच रहा। हालांकि असल नुकसान इससे कहीं ज्यादा हो सकता है। हिमालय नीति अभियान के अनुसार सराज क्षेत्र में कुल 500 करोड़ और केवल थुनाग में 100 से 150 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।

यह रिपोर्ट पर्वतीय क्षेत्रों के लिए एक गंभीर चेतावनी प्रस्तुत करती है। प्राकृतिक आपदाओं का विनाशकारी असर इस बात पर निर्भर करता है कि नदियों के आसपास कितना निर्माण किया गया है। मॉडल तैयार करने के बाद ही वास्तविक सरकारी आंकड़ों से इसका मिलान किया गया था।

बाढ़ के कारण दुकानों, सड़कों, पुलों, जल पाइपलाइनों और खेतों को काफी क्षति पहुंची। अध्ययन में 63 मवेशियों की मौत और 47 मवेशी शेड नष्ट होने की जानकारी दी गई है। इसके अलावा 14 दुकानें पूरी तरह ध्वस्त हुईं और खेतों में रखी फसलें भी बर्बाद हो गईं।

शोधकर्ताओं ने बताया कि अत्यधिक बारिश मुख्य वजह थी, लेकिन संकरा रास्ता और इंसानी हस्तक्षेप नुकसान बढ़ाने के प्रमुख कारण रहे। वैज्ञानिकों ने दुर्गम क्षेत्रों के लिए उपग्रह आधारित हाइड्रोडायनामिक मॉडल बनाया है, जिससे बिना जमीनी आंकड़ों के भी बाढ़ के जोखिम का सटीक आकलन हो सकेगा।

थुनाग की यह घटना सिखाती है कि पहाड़ों में नदियों के प्राकृतिक बहाव से छेड़छाड़ कितनी भारी पड़ सकती है। भविष्य की योजनाओं में नदी के रास्तों को सुरक्षित रखना, निर्माण पर सख्त नियम लागू करना और शुरुआती चेतावनी तंत्र बनाना बेहद जरूरी है ताकि ऐसी आपदाओं को टाला जा सके।

Right News Desk
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लॉ और पत्रकारिता स्नातक, पत्रकारिता में 11 वर्ष का अनुभव

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