Mandi News: हिमाचल प्रदेश में कीरतपुर-मनाली फोरलेन परियोजना ने राज्य में यातायात की पूरी तस्वीर बदल दी है। सुरंग निर्माण के लिए न्यू ऑस्ट्रियन टनलिंग मेथड (एनएटीएम) का इस्तेमाल किया गया है। इस आधुनिक तकनीक से मनाली और चंडीगढ़ के बीच का सफर 10 घंटे से घटकर सिर्फ साढ़े पांच घंटे का रह गया है।
हिमालय की कमजोर पहाड़ियों में भूस्खलन और भूगर्भीय दबाव हमेशा बड़ी चुनौती रहा है। एनएटीएम तकनीक की खूबी यह है कि यह पहाड़ की अपनी प्राकृतिक मजबूती का इस्तेमाल करती है। खुदाई के समय चट्टानों का अध्ययन करके तुरंत सपोर्ट सिस्टम तैयार किया जाता है, जिससे सुरंग के भीतर अनपेक्षित दबाव से आसानी से निपटा जा सके।
पहाड़ी इलाकों में भारी-भरकम टनल बोरिंग मशीन (टीबीएम) हमेशा कामयाब नहीं रही। पार्वती प्रोजेक्ट-द्वितीय के दौरान करीब 150 करोड़ रुपये की टीबीएम पहाड़ के भीतर फंस गई थी, जो अब तक बाहर नहीं निकली। इस कड़वे अनुभव से सीख लेते हुए सुरंग विशेषज्ञ हिमांशु कपूर और टीम ने एनएटीएम तकनीक का सहारा लिया।
इस परियोजना से यात्रियों को खतरनाक रास्तों से राहत मिली है। स्वारघाट की जोखिम भरी चढ़ाई और हणोगी का भूस्खलन जोन अब बीते दिनों की बात बन गए हैं। कीरतपुर से नाचगला के बीच 6,800 मीटर लंबी छह सुरंगें बनी हैं, जिनमें स्वारघाट-कैंचीमोड़ की 3,600 मीटर लंबी जुड़वां सुरंग भी शामिल है।
मंडी बाईपास की चार सुरंगों से मंडी शहर को ट्रैफिक जाम से मुक्ति मिली है। दयोड़ से औट के बीच भी 10 सुरंगों से गाड़ियां गुजर रही हैं। परियोजना की 30 किमी लंबी 19 सुरंगों में 2.50 लाख टन सीमेंट और 2.00 लाख टन स्टील लगा है। पंडोह बाईपास, चार मील और नौ मील सहित 12 अन्य टनल भी योजना का हिस्सा हैं।
इन नई सुरंगों ने सफर की दूरी घटाने के साथ पर्यटन, बागवानी और व्यापार को नया बल दिया है। एनएटीएम तकनीक ने यह साबित कर दिखाया है कि पर्वतीय इलाकों में निर्माण प्रकृति से टकराकर नहीं, बल्कि उसके साथ तालमेल बनाकर ही संभव हो सकता है।
