Himachal Pradesh News: हिमाचल प्रदेश सरकार ने चार नए जिले बनाने की संभावना जांचने के लिए आयोग गठित किया है। लेकिन राज्य पर पहले से एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा कर्ज है। ऐसे में राइट फाउंडेशन के अध्यक्ष सुरेश कुमार ने इस फैसले पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि मौजूदा आर्थिक तंगी में यह कदम उचित नहीं है।
हिमाचल प्रदेश में वर्तमान में बारह जिले हैं। लंबे समय से देहरा, नूरपुर, पालमपुर और सुंदरनगर जैसे क्षेत्रों को अलग जिला बनाने की मांग उठती रही है। सरकार ने हाल ही में रिटायर्ड जस्टिस धर्म चंद चौधरी की अध्यक्षता में चार सदस्यीय आयोग बनाया है। यह आयोग छह महीने में रिपोर्ट देगा। आयोग को बुनियादी ढांचे और कर्मचारियों पर आने वाले खर्च का आकलन भी करना है।
राइट फाउंडेशन के अध्यक्ष सुरेश कुमार ने कहा कि नए जिले बनाने से प्रशासनिक सुविधा तो बढ़ सकती है, लेकिन राज्य की आर्थिक हालत पहले से खराब है। उन्होंने बताया कि हिमाचल पर कुल कर्ज एक लाख करोड़ रुपये के पार है। 2026-27 के अंत तक यह आंकड़ा एक लाख बारह हजार करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। ऐसे में अतिरिक्त खर्च राज्य पर भारी पड़ सकता है।
कैग की रिपोर्ट और बजट दस्तावेजों के अनुसार राज्य का ऋण-जीएसडीपी अनुपात करीब तैंतालीस से चौवालीस प्रतिशत है। सरकार इसे 2029-30 तक चालीस दशमलव चौंसठ प्रतिशत लाने का लक्ष्य रखती है। लेकिन वेतन, पेंशन और ब्याज पर राजस्व का अस्सी से छियासी प्रतिशत खर्च हो जाता है। विकास कार्यों के लिए बहुत कम पैसा बचता है।
सुरेश कुमार ने सरकार को सलाह दी कि आर्थिक तंगी के हालात में चार नए जिले बनाने का फैसला उचित नहीं है। राष्ट्रीय औसत के हिसाब से एक जिले पर पांच सौ से दो हजार करोड़ रुपये खर्च हो सकता है। चार जिलों पर यह दो हजार से आठ हजार करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। इसके अलावा नए अधिकारियों और स्टाफ का सालाना खर्च भी जुड़ जाएगा।
उन्होंने कहा कि राज्य अक्सर नया कर्ज पुराना कर्ज चुकाने के लिए लेता है। सालाना ब्याज भुगतान सात हजार करोड़ रुपये के आसपास पहुंच रहा है। ऐसे में नए जिलों का खर्च या तो और कर्ज बढ़ाएगा या मौजूदा विकास योजनाओं को प्रभावित करेगा। आयोग को चाहिए कि वह खर्च का सही आकलन करे और सरकार को सलाह दे कि मौजूदा संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल कैसे हो।
हिमाचल की अर्थव्यवस्था पहाड़ी इलाके और सीमित राजस्व के कारण केंद्र की मदद पर निर्भर है। सुरेश कुमार ने कहा कि जनता की सुविधा महत्वपूर्ण है, लेकिन कर्ज के बोझ को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने सरकार से अपील की कि रिपोर्ट आने तक कोई जल्दबाजी न करे और वित्तीय स्थिति को प्राथमिकता दे।
