हिमाचल में पर्यटन विकास और पर्यावरण संरक्षण: सुप्रीम कोर्ट की कमेटी की चेतावनी के बीच वैज्ञानिक आकलन की मांग

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himachal Pradesh News: हिमाचल प्रदेश में पर्यटन विकास और पर्यावरण संरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी ने गंभीर नसीहत दी है। राज्य सरकार द्वारा अगले पांच वर्षों में पर्यटन विस्तार के लिए 10 से 15 हजार करोड़ रुपये खर्च करने के लक्ष्य के बीच पर्यावरण और वैनिटी प्रोजेक्ट्स के दुष्प्रभावों पर चिंता जताई गई है।

पर्यटन विकास और रोजगार का संतुलन

हिमाचल प्रदेश में पर्यटन अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण घटक है, जिससे बड़ी संख्या में रोजगार के अवसर सृजित होते हैं और स्थानीय व्यवसायों को संबल मिलता है। देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों के खर्च से ट्रांसपोर्ट से लेकर स्थानीय फल व अन्य उत्पादों के व्यवसायियों को लाभ पहुंचता है। हालांकि, अंधाधुंध विकास और पर्यटकों के अत्यधिक दबाव से स्थानीय व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

भूस्खलन और सड़कों के विस्तार का संकट

कई स्थानों पर सड़कों के विस्तार के लिए पहाड़ों की जड़ों को काटे जाने के कारण भूस्खलन की गति तीव्र हुई है। ग्लोबल वार्मिंग के प्रभावों के चलते बारिश के पैटर्न में बदलाव आया है, जिससे कम समय में अधिक तेज बारिश होने के कारण मिट्टी का कटाव बढ़ा है और पहाड़ दरकने लगे हैं। कीरतपुर-मनाली कॉरिडोर के किनारे 44 संवेदनशील जगहों की पहचान पहाड़ों में अवैज्ञानिक विकास योजनाओं के दुष्प्रभावों को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।

वहन क्षमता (Carrying Capacity) का वैज्ञानिक आकलन

विशेषज्ञों और सुप्रीम कोर्ट की कमेटी का मानना है कि पर्यटन स्थलों की वहन क्षमता (Carrying Capacity) का वैज्ञानिक तरीके से आकलन किया जाना चाहिए। प्रत्येक पर्यटन स्थल का अपना मौलिक स्वरूप और पारिस्थितिकीय सीमाएं होती हैं, जिनका निर्धारण जलापूर्ति, कचरा निस्तारण, सड़कों के नेटवर्क और संवेदनशील भूभाग के आधार पर होना चाहिए। लगातार भीड़ का दबाव झेल रहे पहाड़ी पर्यटन स्थलों पर निजी वाहनों की भारी आमद के कारण पार्किंग की गंभीर समस्या पैदा हुई है और पेड़ों के बड़े पैमाने पर कटान से ढलानों पर भूस्खलन का संकट गहराया है।

इको-टूरिज्म और जवाबदेही की जरूरत

पहाड़ों की अस्मिता की रक्षा के लिए पारदर्शी निगरानी, विभिन्न विभागों के बीच बेहतर तालमेल और सुप्रीम कोर्ट के पैनल के सुझावों का समयबद्ध क्रियान्वयन बेहद जरूरी है। इको-टूरिज्म का उद्देश्य केवल व्यावसायिक दोहन न होकर वनों का वास्तविक संरक्षण होना चाहिए। पेड़ों के कटान के बाद क्षतिपूर्ति के लिए किए जाने वाले पौधरोपण, टुकड़ों में दी जाने वाली कटाई की मंजूरी और रिसॉर्ट्स संस्कृति के अनियंत्रित विस्तार के मामलों में कड़ी जवाबदेही तय करने की मांग की जा रही है, ताकि संभावित प्राकृतिक आपदाओं से बचा जा सके।

Mohit
Mohit
पत्रकारिता के क्षेत्र में 9 सालों का अनुभव।

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