Shimla News: हिमाचल प्रदेश सरकार ने राज्य में प्रशासनिक इकाइयों और नए जिलों के गठन की संभावना तलाशने के लिए एक विशेष आयोग बनाया है। इस फैसले के बाद राज्य में राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी ने विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उठाए गए इस कदम पर कड़े सवाल खड़े किए हैं।
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने इस साल 22 मई को इस आयोग के गठन की प्रक्रिया शुरू की थी, जिसकी आधिकारिक अधिसूचना 14 अक्टूबर को जारी कर दी गई। हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश धर्म चंद चौधरी इस आयोग के अध्यक्ष होंगे। चार सदस्यीय इस आयोग में अन्य अधिकारी भी शामिल हैं, जिन्हें छह महीने के भीतर रिपोर्ट सौंपनी है।
राजनीतिक विवाद और भाजपा के गंभीर आरोप
भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस सरकार पर निशाना साधते हुए कहा है कि सरकार अपने चुनावी वादे पूरे करने में पूरी तरह नाकाम रही है। पार्टी नेताओं का आरोप है कि सरकार अपनी विफलताओं से जनता का ध्यान भटकाने के लिए जिलों के पुनर्गठन का यह नया शिगूफा छोड़ रही है। चुनावों से ठीक पहले यह फैसला क्यों लिया गया?
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। उन्होंने अपने फैसले का बचाव करते हुए इसे व्यवस्था परिवर्तन का नाम दिया है। सरकार का मुख्य उद्देश्य प्रशासन को आम जनता के और अधिक करीब लाना है, ताकि दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को आसानी से सभी सरकारी योजनाएं मिल सकें।
हिमाचल में 1972 में हुआ था बड़ा बदलाव
हिमाचल प्रदेश में आखिरी बार जिलों का बड़ा पुनर्गठन 1 सितंबर 1972 को किया गया था। उस समय कांगड़ा जिले को विभाजित करके हमीरपुर और ऊना जिले बनाए गए थे। इसके बाद से राज्य में जिलों की कुल संख्या नौ से बढ़कर बारह हो गई थी। जानकारों का कहना है कि इतने लंबे अंतराल के बाद पहली बार किसी प्रशासनिक आयोग का गठन किया गया है।
राज्य के पहाड़ी इलाकों में सरकारी सेवाओं तक पहुंच बनाना आज भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। डोडरा क्वार और पांगी जैसे दूरदराज के क्षेत्रों के लोगों को मुख्यालय तक पहुंचने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इसी भौगोलिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए प्रशासनिक इकाइयों के पुनर्गठन की मांग लंबे समय से लगातार उठाई जा रही थी।
वित्तीय संकट और बुनियादी सुविधाओं की चुनौती
विपक्ष के नेता जय राम ठाकुर और पूर्व मंत्री सतपाल सिंह सत्ती ने राज्य की वित्तीय स्थिति का हवाला देते हुए सरकार को घेरा है। उनका कहना है कि नए जिले बनाने के लिए भारी भरकम धन, प्रशासनिक भवनों और बुनियादी ढांचे की जरूरत होती है। पहले से ही गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहे हिमाचल प्रदेश पर इस फैसले से वित्तीय बोझ और अधिक बढ़ जाएगा।
दूसरी ओर, आयोग की जमीनी हकीकत यह है कि औपचारिक गठन के बाद भी उसे अभी तक बैठने के लिए कोई कार्यालय, कर्मचारी या वाहन जैसी बुनियादी सुविधाएं तक नहीं मिल पाई हैं। छह महीने के छोटे से कार्यकाल में रिपोर्ट तैयार करने की चुनौती के बीच आयोग के सामने संसाधनों की कमी एक बड़ी बाधा बनकर सामने आ रही है।
आयोग की रिपोर्ट तय करेगी आगे का भविष्य
आयोग मौजूदा तहसीलों, उपमंडलों और विकास खंडों की कार्यप्रणाली की बारीकी से जांच करेगा। यह अध्ययन किया जाएगा कि नई प्रशासनिक इकाइयों का गठन किया जाए या फिर मौजूदा इकाइयों का आपस में विलय किया जाए। जनसंख्या और भौगोलिक स्थिति के आधार पर ही आयोग अपनी अंतिम सिफारिशें सरकार को सौंपेगा, जिसके बाद मुख्यमंत्री अंतिम निर्णय लेंगे।
