हिमाचल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, कर्मचारियों के वेतन विसंगति और सहकारी संस्थाओं में सरकारी दखल पर लगाई रोक

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Shimla News: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने विभिन्न मामलों में अहम फैसले सुनाए हैं। अदालत ने स्वास्थ्य शिक्षकों के वेतन मामले में सरकार की नीति को गलत ठहराया। इसके साथ ही सहकारी सभाओं में बिना शेयर दखल, भूमि अधिग्रहण मुआवजे में देरी पर ब्याज और विधि स्नातकों की जांच पर कड़े निर्देश जारी किए हैं।

न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों के हक में फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि पदोन्नति वाले उच्च पद का वेतनमान निचले फीडर पद से कम या बराबर नहीं हो सकता। कोर्ट ने 30 जनवरी 2016 की अधिसूचना को पूरी तरह रद्द कर दिया है।

स्वास्थ्य विभाग में स्वास्थ्य शिक्षक एक प्रमोशनल पद है, जिसके लिए ग्रेजुएशन और डिप्लोमा अनिवार्य है। वहीं निचले फीडर पद मल्टीपर्पज हेल्थ सुपरवाइजर के लिए योग्यता मैट्रिक है। सरकार ने 2012 में सुपरवाइजर का ग्रेड पे बढ़ाकर 4200 रुपये कर दिया, लेकिन स्वास्थ्य शिक्षकों को महज 3800 रुपये पर ही छोड़ दिया गया था।

बाद में कर्मचारियों के विरोध पर सरकार ने शिक्षकों को 4200 ग्रेड पे दिया, मगर इसे 2016 से लागू किया। हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि सरकार मामले पर दोबारा विचार करे। अदालत ने स्वास्थ्य शिक्षकों को फीडर पद से अनुपातिक रूप से ज्यादा ग्रेड पे 1 अक्टूबर 2012 से देने का निर्देश दिया।

सहकारी सोसायटी में सरकारी दखल पर हाईकोर्ट की रोक

हाईकोर्ट ने सहकारिता सोसायटियों की स्वायत्तता पर कहा कि यदि सरकार का वित्तीय शेयर या गारंटी नहीं है, तो उसे बोर्ड में प्रतिनिधि भेजने का अधिकार नहीं है। खंडपीठ ने सोलन जिला सहकारी विपणन संघ में तीन गैर-सरकारी सदस्यों के मनोनयन को अवैध घोषित करते हुए 16 मार्च 2026 की अधिसूचना रद्द कर दी।

अदालत ने स्पष्ट किया कि जब सोसायटी ने पुराना लोन और शेयर वापस कर दिया है, तो सरकार का अधिकार खत्म हो जाता है। खंडपीठ ने तीनों सदस्यों की सदस्यता तुरंत प्रभाव से निरस्त कर दी। कोर्ट ने सोलन जिला फेडरेशन को 31 अक्तूबर या उससे पहले नए सिरे से निष्पक्ष चुनाव कराने के निर्देश दिए।

मुआवजे में देरी पर ब्याज और वकीलों की जांच

न्यायाधीश संदीप शर्मा ने नेशनल हाईवे-72 निर्माण के भूमि अधिग्रहण मामले में देरी पर ब्याज देने का आदेश दिया। अदालत ने कहा कि अवॉर्ड पारित होने के बाद राशि रोकने का कोई औचित्य नहीं था। केंद्र सरकार को 367 दिनों की देरी पर 7.5 प्रतिशत की दर से ब्याज दो हफ्ते में जमा करना होगा।

तय समय पर भुगतान न होने पर सरकार को 18 प्रतिशत की दर से ब्याज देना पड़ेगा। वहीं मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने विधि स्नातकों के पंजीकरण से पहले उनके आपराधिक बैकग्राउंड की जांच को लेकर नोटिस जारी किया है। बार काउंसिल के नियमों के तहत नैतिक अधमता में दोषी व्यक्ति वकालत के लिए अयोग्य होता है।

Desh Raj
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