Chamba News: हिमाचल प्रदेश की पारंपरिक धरोहर ‘चम्बा रूमाल’ कला आज अपने अस्तित्व की सबसे बड़ी लड़ाई लड़ रही है। इस नायाब कला की अंतिम प्रमुख शिल्पी ललिता वकील पिछले कई दशकों से इसे बचाने के लिए अकेले संघर्ष कर रही हैं। सफेद मलमल के कपड़े पर दोनों तरफ एक जैसी बारीक कढ़ाई उकेरने वाली यह प्राचीन कला आज लुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी है।
चम्बा रूमाल की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत
हिमाचल प्रदेश का चम्बा जिला अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए भी जाना जाता है। यहां की संकरी गलियों में आज भी 65 वर्ष से अधिक उम्र की वरिष्ठ शिल्पी ललिता वकील बिना चश्मे के सफेद मलमल पर रेशमी धागों से जादुई कढ़ाई करती हैं। चम्बा रूमाल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जब कढ़ाई पूरी होती है, तो कपड़े के आगे और पीछे दोनों हिस्से बिल्कुल एक समान नजर आते हैं।
इस रूमाल को केवल एक साधारण कपड़ा नहीं माना जाता, बल्कि इसमें महाभारत, रासलीला और भगवान कृष्ण की कथाओं को रेशमी धागों से बुनकर एक जीवित कविता की तरह उकेरा जाता है। इतिहास के पन्नों को पलटें तो 16वीं और 17वीं शताब्दी में चम्बा के राजाओं के संरक्षण में इस कला का अभूतपूर्व विकास हुआ था। हालांकि, 18वीं सदी के अंत में राजाओं का युग समाप्त होने के बाद इस कला का महत्व भी घटने लगा।
आर्थिक संकट और मशीनरी की चुनौती
एक समय था जब चम्बा रूमाल को शाही संरक्षण प्राप्त था, लेकिन समय के साथ इसके कद्रदान कम होते चले गए। एक उत्कृष्ट रूमाल को तैयार करने में तीन से छह महीने तक का लंबा समय लगता है। इसमें इस्तेमाल होने वाला रेशमी धागा और विशेष कपड़ा काफी महंगा होता है।
बाजार में जब मशीन से बने सस्ते और नकली रूमाल आने लगे, तो स्थानीय कारीगरों और महिलाओं का इस पारंपरिक काम से मोहभंग होने लगा और उन्होंने इसे छोड़ दिया। ललिता वकील का निजी जीवन भी इस कला को बचाने की एक निरंतर और चुप्पी भरी लड़ाई रहा है। पारिवारिक जिम्मेदारियों और गंभीर आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने अपनी कला की शुद्धता से कभी समझौता नहीं किया। कई बार उन्होंने रात-रात भर मोमबत्ती की रोशनी में काम किया, जिसका बुरा असर उनकी आंखों पर भी पड़ा। समाज के लोगों ने उन्हें इस उम्र में आराम करने की सलाह दी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
नई पीढ़ी को निशुल्क प्रशिक्षण दे रही हैं ललिता
ललिता वकील भली-भांति जानती हैं कि यदि यह कला केवल उनके तक ही सीमित रही, तो उनके बाद इसे संभालने वाला कोई नहीं बचेगा। इसी चिंता को दूर करने के लिए उन्होंने अपने घर के बरामदे को ही एक निशुल्क पाठशाला में बदल दिया है।
पिछले चार दशकों से वे चम्बा और आसपास के गांवों की सैकड़ों लड़कियों को चम्बा रूमाल की जटिल कढ़ाई मुफ्त में सिखा रही हैं। इतना ही नहीं, वे अपनी खुद की बचत से उन जरूरतमंद लड़कियों के लिए महंगा रेशम और कपड़ा खरीदती हैं, ताकि किसी भी युवा बेटी की आर्थिक स्थिति उनकी सीख में बाधा न बने। उनके इन अथक प्रयासों से आज कुछ लड़कियां आत्मनिर्भर जरूर बन रही हैं, लेकिन प्राचीन कढ़ाई की मूल शुद्धता और नजाकत को आने वाली पीढ़ी तक सुरक्षित रखना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।