ब्रेन डेथ और कोमा के बीच का अंतर समझना है जरूरी, जानिए कैसे एक सही फैसला बचा सकता है कई जिंदगियां

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New Delhi News: किसी परिजन के ब्रेन डेथ की खबर सुनना किसी भी परिवार के लिए बेहद कठिन होता है। कोमा के विपरीत ब्रेन डेथ ऐसी स्थिति है जिससे मरीज कभी ठीक नहीं हो सकता। इसमें मस्तिष्क स्थायी रूप से काम करना बंद कर देता है, हालांकि वेंटिलेटर की मदद से दिल धड़कता रहता है।

ब्रेन डेथ की पुष्टि के लिए सख्त मेडिकल प्रोटोकॉल

ब्रेन डेथ की घोषणा डॉक्टरों की एक विशेष टीम पूरी मेडिकल और कानूनी जांच के बाद ही करती है। मस्तिष्क की सक्रियता जांचने के बाद ही इसकी पुष्टि होती है। यह ध्यान रखना जरूरी है कि ब्रेन डेथ घोषित करने वाली टीम और ट्रांसप्लांट टीम दोनों बिल्कुल अलग होती हैं, जिससे फैसला पूरी तरह निष्पक्ष रहे।

सहमति के बाद शुरू होती है जीवन रक्षक प्रक्रिया

यदि मरीज पहले से डोनर के तौर पर रजिस्टर्ड हो या परिवार कानूनी सहमति दे, तो प्रक्रिया शुरू होती है। दान किए गए अंगों का मेडिकल मूल्यांकन कर जरूरतमंद मरीजों से मिलान किया जाता है। दिल, लिवर, किडनी, फेफड़े, पैनक्रियाज और टिशू कई गंभीर मरीजों को नया जीवन दे सकते हैं।

जागरूकता से दूर हो सकती हैं अंगदान की भ्रांतियां

दुख की घड़ी में परिवार के लिए अंगदान का फैसला लेना आसान नहीं होता। ऑर्गन डोनेशन का मतलब मरीज के इलाज को जबरन लंबा खींचना बिल्कुल नहीं है। यह प्रक्रिया ब्रेन डेथ की पूर्ण पुष्टि के बाद ही शुरू होती है। सही जानकारी और जागरूकता से ही कई लोगों की जिंदगी बचाई जा सकती है।

Desh Raj
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